किस्सागोई : वाचिक परंपरा का नया दौर:हिमांशु बाजपेयी
राजकमल स्थापना दिवस पर आयोजित ‘भविष्य के स्वर’ में एक वक्तव्य प्रसिद्ध दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी का भी था। हिंदुस्तानी की वाचिक परम्परा के वे चुनिंदा मिसालों में एक हैं। उनको सुनते हुए लुप्त होती...
View Articleकला ही ऐसा माध्यम है जो हमें अपने अंतःकरण की प्रस्तुति करने में समर्थ बनाता...
राजकमल स्थापना दिवस पर आयोजित ‘भविष्य के स्वर’ आयोजन में पहली बार जिज्ञासा लाबरू को सुना। हम हिंदी वाले बाहर की दुनिया के बारे में कितना कम जानते हैं। अगर उस दिन जिज्ञासा को नहीं देखा, सुना होता तो यह...
View Article‘फैन कल्चर’ का दौर : भविष्य का आलोचक:मृत्युंजय
मृत्युंजय कवि हैं और कविता के हर रूप में सिद्धहस्त हैं। सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों तरह की आलोचना में समान महारत रखते हैं। बस कम लिखते हैं लेकिन ठोस लिखते हैं। जैसे राजकमल प्रकाशन स्थापना दिवस पर...
View Articleभविष्य का समाज: सहजीविता के आयाम: जसिंता केरकेट्टा
जसिंता केरकेट्टा कवयित्री हैं, आदिवासी समाज की मुखर आवाज़ हैं। राजकमल स्थापना दिवस के आयोजन में 28 फ़रवरी को ‘भविष्य के स्वर’ के अंतर्गत उनका वक्तव्य सहजीविता के आयामों को लेकर था- मॉडरेटर...
View Articleसिनेमा की बदलती ज़मीन : भविष्य का सिनेमा:मिहिर पंड्या
मिहिर पांड्या सिनेमा पर जो लिखते बोलते हैं उससे उनकी उम्र की तरफ़ ध्यान नहीं जाता। हिंदी में इस विधा का उन्होंने पुनराविष्कार किया है। यह बात अलग से रेखांकित कर्नी पड़ती है कि वे 40 साल के कम उम्र के...
View Articleस्मृतिलोप का दौर: भविष्य की कविता: सुधांशु फ़िरदौस
सबसे अंत में कवि बचता है, कविता बचती है। 28 फ़रवरी को आयोजित राजकमल स्थापना दिवस के आयोजन ‘भविष्य के स्वर’ में एक युवा कवि का वक्तव्य था, सुधांशु फ़िरदौस का। हम उनकी कविताओं में ऐसा खो जाते हैं कि यह...
View Articleफ़िराक़ गोरखपुरी की कहानी ‘रैन बसेरा’
उर्दू के मशहूर शायर फ़िराक गोरखपुरी की शायरी के बारे में किसी को बताने की ज़रूरत नहीं, सब जानते हैं कि वे किस पाए के शायर थे. उनको अपनी शायरी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था. लेकिन यह कम लोग जानते...
View Articleरेणु, आज़ादी के स्वप्न और मैला आँचल:हृषीकेश सुलभ
आज फणीश्वरनाथ रेणु जयंती है। आज से उनकी जन्म शताब्दी का साल भी शुरू हो रहा है। वे एक बड़े विजन के लेखक थे। उनकी अमर कृति ‘मेला आँचल’ की चर्चा के बिना आधुनिक हिंदी साहित्य की कोई भी चर्चा अधूरी ही मानी...
View Articleरेणु के ‘लोकल’ का फलक दरअसल ‘ग्लोबल’ है
फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों, कहानियों में आंचलिकता कोई सीमा नहीं थी बल्कि वह आज़ाद भारत के ग्रामीण समाज के विराट स्वप्न के लेखक थे, जो शहरीकरण को विकास का एकमात्र पैमाना नहीं मानते थे न ही गाँवों को...
View Articleजसिंता केरकेट्टा की कुछ कविताएँ
जसिंता केरकेट्टा झारखंड में रहती हैं और उनकी कविताओं में मूल निवासी समाज का दर्द, संघर्ष नज़र आता है। आज उनकी कुछ कविताएँ पढ़ते हैं जो उनके शीघ्र प्रकाशित होने वाले कविता संग्रह ‘ईश्वर और बाज़ार’ से...
View Articleयतीश कुमार द्वारा ‘कसप’पर काव्यात्मक टिप्पणी
यतीश कुमार बहुत निराले कवि हैं, जब कोई किताब पढ़ते हैं तो उसकी समीक्षा करते हुए कविता लिख देते हैं। पिछले दिनों उन्होंने मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘कसप’ पढ़ा और ऐसे प्रभावित हुए कि कई कविताएँ लिख...
View Articleऑडियो बुक, ऑडिबल और राजपाल एंड संज
किताबों की दुनिया का अगला बड़ा घमासान ऑडियो बुक का क्षेत्र है। ऑडियो बुक के क्षेत्र के बारे में यह माना जा रहा है कि आने वाले समय में इससे वे पाठक भी हिंदी से जुड़ सकते हैं जो किताबें नहीं पढ़ते हैं।...
View Articleरेगिस्तान, नदी, समुद्र, पर्वतों को पार करने वाले मेरे सफर कहाँ हैं?
आर्थर रैंबो 19वीं शताब्दी फ़्रेंच कविता के उन कवियों में हैं जिनकी कविताओं ने आधुनिक कविता को कई रूपों में प्रभावित किया, महज़ 37 साल की आयु में दुनिया छोड़ कर जाने वाले इस लेखक का जीवन भी एक मिथक याँ...
View Articleउषाकिरण खान की कहानी ‘पोर्ट्रेट’
हिंदी और मैथिली की वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान की कहानी पढ़िए। एक साधारण सी घटना की करूण कहानी- मॉडरेटर ================ नरेश ने बीए पास कर लिया था। इतिहास आनर्स था। उसका रिजल्ट संतोषजनक रहा। उच्च अंक...
View Articleमहिला दिवस क्यों कहते हैं ? स्त्री दिवस क्यों नहीं?
आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। इस मौक़े पर युवा लेखिका अनुकृति उपाध्याय का यह लेख पढ़िए- मॉडरेटर ========================= जब मेरा बेटा तीन या चार साल का था, हम अक्सर एक किताब पढ़ा करते थे – सालाना...
View Articleपेशेवर हूँ सर, पेशेवाली नहीं!
नीलिमा चौहान की पतनशील सीरिज़ हिंदी के स्त्री विमर्श की जड़ता को तोड़ने वाली किताबें हैं। पतनशील पत्नियों के नोट्स और ऑफ़िशियली पतनशील ने भाषा विमर्श के नए मेयार बनाए। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर...
View Articleडेनिश औरतें अनगिनत कन्वेंशनल बक्सों से आज़ाद हैं!
पूनम दुबे के यात्रा वृत्तांत हम पढ़ते रहे हैं, उनक एक उपन्यास ‘चिड़िया उड़’ प्रकाशित हो चुका है। इस बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उनका यह लेख पढ़िए- जानकी पुल। =================== तकरीबन आठ महीने हो...
View Articleजौन एलिया का लेख ‘मर्द बुर्का ओढ़ें’
शायर इरशाद ख़ान सिकन्दर ने हाल में ही ‘ज़ौन एलिया का जिन्न’ नामक नाटक लिखा है जिसका निर्देशन जाने माने रंग निर्देशक रंजीत कपूर ने किया है और जिसका प्रदर्शन होने वाला है। उसके लिए उन्होंने काफ़ी शोध...
View Articleमिखाइल बुल्गाकोव की कहानी ‘देसी दारू का तालाब’
कल महान रूसी लेखक मिखाइल बुल्गाकोव की 80 वीं पुण्यतिथि थी। उनकी इस व्यंग्य रचना का मूल रूसी भाषा से अनुवाद किया है ए.चारुमति रामदास जी ने- मॉडरेटर ===================================================...
View Articleयतीश कुमार द्वारा ‘मैला आँचल’की काव्यात्मक समीक्षा
युवा कवि यतीश कुमार की काव्यात्मक समीक्षाओं के क्रम में इस बार पढ़िए रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ पर उनकी यह टिप्पणी। यह रेणु जी की जन्म शताब्दी का साल है। उनकी रचनाओं को नए सिरे से पढ़ने, नए संदर्भों...
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