आज सुबह सुबह आलोचक-प्रोफ़ेसर पंकज पराशर का यह लेख पढ़ा। पढ़ते ही साझा करने का ऐसा मन हुआ कि एयरपोर्ट पर बैठे बैठे आज पहली बार फ़ोन से पोस्ट कर रहा हूँ। मैं यात्रा में हूँ, आप इस लेख के साथ परतदार बनारस की यात्रा कीजिए- प्रभात रंजन
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संतों-असंतों और घोंघाबसंतों के काशी को ज़्यादातर लोग जानते हैं। ‘देख तमासा लकरी’ के ‘गुरु’-चेला को जानते हैं। असी गंग के तीर पर श्रावण शुक्ला सप्तमी को शरीर तजने वाले तुलसीदास और तुलसी बाबा से भाषा सीखने वाले ‘कबी’ त्रिलोचन शास्त्री (हालाँकि आचार्य नामवर सिंह की माताशास्त्री जी को हमेशा ‘तस्तरी’ जी ही कहकर बुलाती थीं) के काशी को भी जानते हैं, जहाँ यथार्थ से अधिक मिथक में शास्त्री जी तैर कर गंगा पार करलेते थे! थोड़ा-बहुत उस काशी को भी आप जानते होंगे, जहाँ हँसिया के बियाह में खुरपी के गीत गाने वाले ज्ञानीजन ‘ज़ायका’ का तमगा पाते हैं और चूतिया के पर्याय के रूप में विद्वजन ‘परम’ पद पाते हैं! उस काशी को भी आप थोड़ा जानते हैं, जहाँ, ‘अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है!’…और बाबू काशीनाथ सिंह की मानें, तो ‘हर हर महादेव’ के साथ ‘भोंसड़ी के’ नारा इसका (अस्सी का) सार्वजनिक अभिवादन है!’ कौन जाने मिर्ज़ा ग़ालिब के समय के बनारस में भी हर-हर महादेव के साथ ऐसा ही कोई मौलिक सार्वजनिक अभिवादन प्रचलित रहा हो! पर केदारनाथ सिंह की आँखों से तो आपने ऐसा बनारस देखा है, जो आधा ही है, ‘अद्भुत है इसकी बनावट/ यह आधा जल में है/ आधा मंत्र में/ आधा फूल में है/ आधा शव में/ आधा नींद में है/ आधा शंख में/ अगर ध्यान से देखो/ तो यह आधा है/ और आधा नहीं भी है!’ जिस काशी नगरिया को कोई ठगवा लूट लेता है, उस बनारस का एक रूप उन्नीसवीं सदी में भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ने देखा था, ‘देखी तुमरी कासी लोगों देखी तुमरी कासी/ जहाँ विराजें विश्वनाथ विश्वेश्वर जी अविनासी/ घाट जाएँ तो गंगा पुत्तर नोचे दे गलफाँसी/ आधी कासी भाँड़ भंडेरिया लुच्चे और संन्यासी। यह सेठ अमीचंद के ख़ानदान के चश्मो-चराग़ क़िब्ला ‘रसा’ ही थे, जो यह सब कह सकने का साहस कर सकते थे, वरना बनारस के पंडों से तो भगवान भी नहीं बचा पाता! कहते हैं ‘महात्मा’ बनने से पहले जब मोहनदास करमचंद गाँधी सन् 1903 में पहली बार बनारस गए, तो हिंदू होने के कारण स्वाभाविक रूप से काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन की इच्छा हुई। मगर वहाँ मक्खियों के झुंड और दुकानदारों व तीर्थयात्रियों का शोर असहनीय था।मंदिर पहुँचने पर गाँधी जी का सामना सड़े हुए फूलों की दुर्गंध से हुआऔर उन्होंने देखा कि लोग सिक्कों को अपनी भक्ति को जाहिर करने का जरिया बनाए हुए हैं। उन्होंने भी एक रूपया चढ़ाया। पंडों को उम्मीद थी कि बैरिस्टर गाँधी चढ़ावे में बड़ी रकम चढ़ाएँगे, लेकिन एक रुपये का सिक्का देखकर गुस्से में पंडा जी ने उनके सामने वह सिक्का उठाकर फेंक दिया। ढीठ गाँधी ने जब सिक्का उठाकर अपनी जेब में रख लिया, तो थोड़ी देर के बाद उसी पंडा जी ने यह कहकर उनसे वह सिक्का माँगा कि चढ़ावा नहीं लेने पर शिव जी का अपमान होगा!
बनारस में जहाँ मनुष्य और सत्ता के जीवन-मरण का अनंत चक्र मणिकर्णिका से लेकर हरिश्चचंद्र घाट तक सदियों से चला आ रहा है, उस बनारस को आप नहीं जानते होंगे, यह भला कौन कह सकता है! लेकिन बनारस सिर्फ़ बनारस तक ही तो महदूद नहीं है! बनारस के बाहर इस पृथ्वी पर कहाँ-कहाँ लगा है बनारस-वृक्ष का कलम ये आपको शास्त्र-पुराण, इतिहास-भूगोल उतना नहीं बता पाएगा। जितना वह बता पाएगा, जो बनारस में आता तो है, मगर बनारस में रह नहीं पाता। जो बनारस में नहीं रह पाता, उसके भीतर कितना-कितना और कितनी-कितनी दूर तक आता-और चला जाता है बनारस, उसे बनारस में रहकर भी नहीं जानते बनारसी! अगर आप समझते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का सुबह-ए-बनारस सिर्फ़ मंडुवाडीह से राजघाट तक ही महूदद है, तो यकीन मानिये आप उन बनारसों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, जो बनारस से गए लोगों के दिलों में कई दशक बीत जाने के बाद भी हूक की तरह उठता है। सन् 1729 में अस्तित्व में आए पाकिस्तान के शहर कराची के अति व्यस्ततम क्षेत्र में एक चौक का नाम है ‘बनारस चौक’। जिससे थोड़ी दूर पर है ‘बिहारी बस्ती’। बनारस चौक इलाक़े में रहने वाले बनारस से गए लोगों ने अपने दिल से निकाल कर कराची शहर की ज़मीन पर बनारस का एक कलम लगा दिया! फ़र्क बस इतना कि यह बनारस वरुणा और गंगा नदी वाला बनारस है और वह बनारस ल्यारी और म्यारी के किनारे बसा बनारस! बनारस में वे लोग तो हैं ही जिनके पुरखे सदियों से बनारस में रहे और वे लोग भी जो पढ़ाई-दवाई से लेकर ‘काश्यां मरणान मुक्ति’ की आस में बनारस आए और आकर ऐसा जमे कि सामने घाट से लेकर नटिनियाँ दाई तक जहाँ ठौर मिला, फैल गए!विश्वनाथपुरी से लेकर तरना, शिवपुर, सारनाथ, आशापुर और नगवाँ तक जम गए। पर जो लोग एक नये भविष्य और एक नया ख़्वाब लेकर बनारस से नये-नये बने मुल्क पाकिस्तान गए, वे वहाँ जाकर भी न अपना बनारसीपन छोड़ पाए, न बनारसी खान-पान, न रहन-सहन और न बनारसी तौर-तरीक़ा!
ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी मीर ने कहा है, ‘रोज़ आने पे नहीं निस्बत-ए-इश्क़ी मौक़ूफ़ /उम्र भर एक मुलाक़ात चली जाती है’, सो, बनारस वहाँ भी उन लोगों के साथ गया, जो 1947 के विभाजन में पाकिस्तान जाते हुए वे अपने पीछे छोड़ आए थे। आपको यह जानकार हैरत होगी कि बनारस से कराची जाकर बसे बनारस के लोग आज भी अपने को बनारसी (हिंदुस्तानी) ज़्यादा समझते हैं, पाकिस्तानी कम। बनारस से उनके लगाव और मोहब्बत की इंतहा यह है कि कराची में बाकायदा ‘बनारस नेशनल फाउंडेशन’ नाम से एक मजबूत संगठन है, जो ओरंगी टाउन, बनारस बाज़ार चौक है। यह संगठन कराची शहर में ‘बनारस नेशनल फाउंडेशन हॉस्पिटल’ नाम से तमाम सुविधाओं से लैस बहुत बड़ा एक अस्पताल चलाता है। ‘बनारस नेशनल फाउंडेशन लाइब्रेरी’ के नाम से बहुत बड़ा पुस्तकालय और ‘बनारस नेशनल फाउंडेशन मैरिज हॉल’ में बनारस से उखड़कर गए लोगों के लिए शादी-ब्याह के लिए बड़ी-सी जगह मुहैया कराता है। …और बात जब बात शादी-ब्याह की निकल ही आई, तो बतातें चलें कि बनारसी सिल्क साड़ी पाकिस्तान में भी इतना मशहूर है कि इसे लेने के लिए लोग ‘बनारसी सिल्क हाउस, कराची’ जरूर जाते हैं। कराची के बनारस मोहल्ले में साड़ियों की अकेले पाँच-छह सौ दुकानें हैं। हिंदुस्तान की तहज़ीब और कलाकारी के कद्रदान शादी-ब्याह में खरीदारी करने कराची के बनारस बाज़ार ही जाते हैं। बनारस बाज़ार इलाक़े में चार मोहल्ले हैं, मसलन सुलेमानी, रहमानी, फ्रंटियर और रब्बानी…और वहाँ भी घर-घर में वही बनारसी साड़ी के काम होते हैं, जो काम आज भी हिंदुस्तान के बनारस के विभिन्न मोहल्ले में साड़ियों के बुनकर करते हैं। बनारसी पान के दीवानों के क्या कहने! बनारसी पान वहाँ वाया दुबई जाए या दुनिया के किसी कोने से वाया होकर पहुँचे, पान के बिना उन्हें चैन कहाँ! पान के दीवाने तो कराची में बनारस बाज़ार के पड़ोसी बिहारी बस्ती के लोग भी कम नहीं हैं। यूँ तो बिहारी बस्ती पाकिस्तान के तकरीबन हर शहर में है, लेकिन सबसे मशहूर बिहारी बस्ती कराची की है, जिसकी आबादी लगभग दो लाख है। बनारस से अस्सी-नब्बे किलोमीटर दूर बिहार के सासाराम में जन्मे कई बुजुर्ग वहाँ आज भी हैं और सासाराम की तरह कराची के इस मोहल्ले में आप जगह-जगह बाटी-चोखा और बिहारी कबाब का लुत्फ़ उठा सकते हैं। लालू-नीतीश की लगी हुई तस्वीर देख सकते हैं। शकेब बनारसी की एक ग़ज़ल से दो शेर देखिये, ‘तू न आया तिरी यादों की हवा तो आई/ दिल के तपते हुए सहरा पे घटा तो आई/ मैं तो समझा था कि अब कोई न अपना होगा/ तेरे कूचे से मगर हो के सबा तो आई।’
हिंदी, भोजपुरी, संस्कृत और अँगरेज़ी से दूर उर्दू और फारसी में रचा-बसा और भरा-पूरा जो बनारस है, उस बनारस को आम तौर पर लोग कहाँ देख पाते हैं। लेकिन बकौल हफ़ीज़ बनारसी, ‘मैंने आबाद किए कितने ही वीराने ‘हफ़ीज़/ ज़िंदगी मेरी इक उजड़ी हुई महफ़िल ही सही’। जिनकी ज़िंदगी उजड़ी महफिल बन गई, जिनके बुजुर्गों के कब्र बनारस में और उम्मीदों के कब्र कराची शहर के कब्रिस्तानों में दफ़न हो गए, उन लोगों के दिलों में जो बनारस है, क्या वह वही बनारस तो नहीं, जिसे मिर्ज़ा ग़ालिब ने ‘क़ाबा-ए-हिंदुस्तान’ कहा! नजमुद्दौला, दबीरुल्मुल्क, निजाम जंग मिर्ज़ा असदउल्लाह बेग ख़ाँ उर्फ़ मिर्ज़ा ग़ालिब के दिल में तीर हालाँकि कलकत्ते ने भी मारा था (कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हम-नशीं/ इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाए हाए) और क़िब्ला हाय-हाय करके रह गए थे, लेकिन बनारस का जो तीर उनके दिल पर लगा, तो वह तीरता-उम्र उनके दिल से नहीं निकला। बावजूद इसके कि वे सफर करने से थोड़ा घबराते थे और बेहद ज़रूरी होने पर ही सफर के लिए नीयत बाँध पाते थे,‘लिए जाती है कहीं एक तवक़्क़ो ग़ालिब/ ज़ादे-राह कशिश-ए-काफ़े-करम है हमको।’ लेकिन मिर्ज़ा जब अपनी निराली सुबह के लिए मशहूर बनारस पहुँचे तो उनके ज़ज्बात फ़ारसी ज़बान में ‘चराग़-ए-दैर’ बनकर फूट पड़ा। ‘चराग़-ए-दैर‘ पढ़ते हुए उस बनरास की याद बारहा आई। पेंशन के सिलसिले में सन् 1827 या 1828 में दिल्ली से कलकत्ते के सफ़र पर निकले मिर्ज़ा असदउल्लाह खाँ ‘ग़ालिब’ ने दिल्ली से कलकत्ते का सफ़र दस महीने में पूरा किया और इन दस महीनों में अकेले बनारस में उन्होंने पाँच महीने क़याम किया। जबकि जिस लखनबी तहज़ीब को लेकर बहुत-सी बातें की जाती हैं, उस लखनऊ में उस वक़्त के बादशाह के एक वज़ीर ने उनसे बदतमीज़ी से पेश आने की कोशिश की, तो उन्होंने ये शेर, ‘सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का/ वो इक गुलदस्ता है हम बे-ख़ुदों के ताक़-ए-निस्याँ का’ कहते हुएइलाहाबाद शहर का रुख किया।
इलाहाबाद से बनारस का सफ़र उन्होंने घोड़े पर बैठकर किया और जब बनारस की दहलीज़ पर पहुँचे, तो उनका पूरा बदन बुख़ार से तप रहा था। दोस्तों की बदसुलूकियों का घाव दिल में अलग से दर्द दे रहा था, लेकिन गंगा के साहिल की हवा, जमना के साहिल की हवा से ज़्यादा ग़ालिब को रास आई और वे दो-चार दिन में ही तरो-ताज़ा हो गए। सुबह-ए-बनारस की खूबसूरती पर फिदा होकर फारसी में ‘चराग़–ए–दैर’ नाम से 108 अशआर की मसनवी लिखी। ‘चराग़–ए–दैर’ का मानी होता है मंदिर का दीया। फ़ारसी के इस मसनवी में जब वे मंदिर के दीये का जिक़्र करते हैं, तो वहाँ के घाटों की ख़ूबसूरती, लाला के फूल, भँवरों की गुनगुनाहट, वहाँ की तंग गलियों, मंदिर की आरती और बनारस की संस्कृति को सराहते हुए इस शहर को फारसी ज़बान में हिंदुस्तान का क़ाबा बताते हैं, ‘इबादत खानः-ए-नाक़ूसियानस्त/ हमाना क़ा’बः-ए-हिंदुस्तानस्त।’ अपनी इस मसनवी में ग़ालिब ने जिस तरह बनारस को देखा है, उस तरह से उर्दू के किसी शायर ने नहीं देखा। हक़ीकत यह है कि दिल के शायर मिर्ज़ा नौशा मंदिर-मस्ज़िद पर दिल को तरज़ीह देते हैं, इसलिए और चीज़ों को ढहाने की बात तो करते हैं, लेकिन दिल को ढहाने की बात नहीं करते, क्योंकि ख़ुदा का असल घर तो इंसान का दिल है। इसलिए एक शायर ने बिल्कुल दुरुस्त फ़रमाया है, ‘बुतखाना तोड़ डालिये, मस्जिद को ढाइये/ दिल को न तोड़िये ये खुदा का मक़ाम है!’
‘चराग़-ए-दैर’ में ग़ालिब ने फ़रमाया है कि अगर मेरे पैरों में मज़हब की जंजीरें न होतीं, तो मैं अपनी तज़्वी तोड़कर जनेऊ धारण कर लेता। माथे पर तिलक लगा लेता और गंगा के किनारे उस वक्त तक बैठा रहता जब तक मेरा यह फ़ानी जिस्म एक बूंद बनकर गंगा में पूरी तरह समा ना जाता। इस तरह अपने तास्सुरात का इज़हार वही शख़्स कर सकता है, जिसे हिंदुस्तान की तहज़ीब से बेपनाह मुहब्बत हो। मसनवी से इतर मोहम्मद अली खाँ के नाम लिखे अपने ख़त में मिर्ज़ा लिखते हैं, ‘बनारस की हवा के ऐजाज़ से मेरे ग़ुबारे–वज़ूद को अलमे–फ़तह की तरह बलंद कर दिया और वज़्दकरती हुई नसीम के झोंकों ने मेरे ज़ोफ़ और कमज़ोरी को बिल्कुल दूर कर दिया। मरहबा! अगर बनारस को उसकी दिलक़शी और दिलनशीनी की वज़ह से सुवैदाए आलम कहूँ, तो बजा है। मरहबा, इस शहर के चारों तरफ़ सब्ज़–ओ–गुल की ऐसी कसरत है कि अग़र इसे ज़मीन पर बहिश्त समझूँ तो रवा है। इसकी हवा को यह ख़िदमत सौंपी गयी है कि वह मुर्दा जिस्मों में रूह फूँक दे। इस की ख़ाक का हर ज़र्रा रहे–रौ के पाँव से पैकाने ख़ार बाहर खैंच ले। अगर गंगा इसके पाँव पर अपना सर न रगड़ता, तो हमारे दिलों में उसकी इतनी क़द्र न होती। अगर सूरज इस के दरो–दीवार से न गुज़रता, तो इतना ताबनाक और मुनव्वर न होता। बहता हुआ दरिया–ए–गंगा (नदी होने के कारण गंगा हिंदी में भले स्त्रीलिंग हो, लेकिन फ़ारसी में दरिया पुल्लिंग की श्रेणी में आता है, इसलिए ग़ालिब ने गंगा और नदी दोनों लफ़्ज का इस्तेमाल पुल्लिंग में किया है।) उस समुंदर की तरह है, जिस में तूफ़ान आया हुआ हो। यह दरिया, आसमान पर रहने वालों का घर है। सब्ज़ रंग परी चेहरा हसीनों की जल्वागाह के मुक़ाबले में क़ुदसियाने माहताबी के घर कतां के मालूम होते हैं। अगर मैं एक सिरे से दूसरे सिरे तक शहर के इमारतों की कसरत से ज़िक्र करूँ, तो वह सरासर मस्तों से आबाद हैं और अगर इस शह्र के एतराफ़े सब्ज़ा–ओ–गुल से बयान करूँ, तो दूर–दूर तक बहारिस्तान नज़र आए।’
मिर्जा नौशा की बनारस पर लिखी यह मसनवी अपनी मिट्टी और संस्कृति से गहरी मुहब्बत की ऐसी मिसाल है, जो मज़हबी अक़ीदों से यक़ीनन अलग थी और जिसका मज़हब था इंसानियत। तो ख़ैर, हम बात नाम बदलने की सियासी चलन की कर रहे थे, तो इस चलन की पड़ताल ज़रा पीछे जाकर करें, तो हम पाते हैं कि ‘काशी’, ‘बेनारेस’ और ‘बनारस’ आदि नामों के बीच 24 मई, 1956 को मिर्ज़ा ग़ालिब, भारतेंदु, प्रेमचंद, प्रसाद के ज़बान पर चढ़े हुए नाम बनारस को वाराणसी कर दिया गया। …और उसके बाद जो लहर चली तो मद्रास को चेन्नई, बंबई को मुंबई, बंगलोर को बंगलुरु और कलकत्ता को कोलकाता करके ही यह लहर थोड़ी थमी। थोड़ी थमी इसलिए लिखना पड़ा कि कौन जाने अब भी किस शहर के नाम को बदलकर क्या से क्या कर दिया जाए! कवि अशोक वाजपेयी से माज़रत चाहते हुए कहूँगा कि शहर अब भी संभावना हो चाहे न हो, शहर के नाम बदलने की अब भी सदैव संभावना है!मिर्ज़ा इस शहर के बारे में कहते हैं, ‘बनारस का क्या कहना! ऐसा शहर कहाँपैदा होता है। इंतहा-ए-जवानी में मेरा वहाँ जाना हुआ। अगर इस मौसम में जवान होता तो वहीं रह जाता। इधर को न आता!’ मिर्ज़ा यहीं नहीं रुकते। कहते हैं, ‘बनारस को दुनिया के दिल का नुक़्ता (बिंदु) कहना दुरुस्त होगा। इसकी हवा मुर्दों के बदन में रूह फूँक देती है। इसकी ख़ाक के ज़र्रे मुसाफ़िरों के तलवे से काँटे खींच निकालते हैं। अगर दरिया-ए-गंगा इसके क़दमों पर अपनी पेशानी (माथा) न मलता तो वह हमारी नज़रों में मोहतरम (पावन) न रहता। अगर सूरज इसके दर-ओ-दीवार के ऊपर से न गुज़रता तो वह इतना रोशन और ताबनाक़ (प्रखर) न होता!’
बनारस को लेकर ग़ालिब की उमगती हुई भावनाओं का अतिरेक देखें कि वे बनारस को ‘फिरदौस-ए-मामूर’(स्वर्गिक रचना) कहकर एक माँ की तरह कान के पीछे काजल लगाकर बनारस की नज़र उतारते हैं, ‘तआलल्लाह बनारस चश्म-ए-बद-दूर/ बहिश्त-ए-ख़ुर्रम-ओ-फिरदौस-ए-मामूर।‘ और ‘बि-सामान-ए-दोआलम गुलिस्तां रंग/जे-ताब-ए-रुख़ चिरागाँ-ए-लब-ए-गंग।’मिर्ज़ा आगे कहते हैं, ‘यहाँ के बुतों अर्थात मूर्तियों और बुतों अर्थात् सुंदरियों की आत्मा तूर के पर्वत की ज्योति के समान है। वह सिर से पाँव तक ईश्वर का प्रकाश है। इन पर कुदृष्टि न पड़े। इनकी कमर तो कोमल है, किंतु हृदय बलवान है। यों इनमें सरलता है, लेकिन अपने काम में वे बहुत चतुर हैं। इनकी मुस्कान ऐसी है कि हृदय पर जादू का काम करती है। इनके मुखड़े इतने सुंदर हैं कि रबी अर्थात चैत के गुलाब को भी लजाते हैं। इनके शरीर की गति तथा आकर्षक कोमल चाल से ऐसा जान पड़ता है कि गुलाब के समान पाँव के फूलों का जाल बिछा देती हैं। माना कि बनारस हिंदुओं का पवित्र शहर है, शिव के त्रिशूल पर बसा है, लेकिन उर्दू और फारसी में दिल में जो बनारस बसा है, उसका क्या करेंगे? पाकिस्तान के शहर कराची के बनारस चौक के इलाके में जो बनारस लाखों लोगों के दिल में है, वहाँ से बनारस को आप निकाल पाएँगे?फारसी ज़बान की दिल की गहराइयों में जो बनारस तीर की तरह पैबस्त है, उसे वहाँ से निकाल पाएँगे? अब लीजिए ये ज़नाब शेख अली हजीं क्या फरमा गए हैं,
अज बनारस न रवम मअवदे आम अस्तईज।
हर बरहमन पेसरे लछमनो राम अस्तईज॥
परी रूख़ाने बनारस व सद करिश्मो रंग।
पथ परात्तिशे महादेव चूँ कुनन्द आरंग॥
व गंग गुस्ल कुनंद व बसंग या मालंद।
जहे शराफते संग व जहे लताफते गंग॥
यानी मैं बनारस से नहीं जाऊँगा, क्योंकि यह सबकी उपासना का स्थान है।यहाँ का प्रत्येक ब्राह्मण राम और लक्ष्मण है। यहाँ परियों जैसी सुंदरियाँ सैकड़ों हाव-भाव के साथ महादेव जी की पूजा के लिए निकलती हैं। वे गंगा में स्नान करती हैं और पत्थर पर अपने पैर घिसती हैं। क्या ही उस पत्थर की सज्जनता है और क्या ही गंगाजी की पवित्रता!
अकबराबाद (आगरा), देहली, बनारस, रामपुर, कलकत्ता आदि से ग़ालिब के बहुत दिलचस्प रिश्ते रहे। ग़ालिब पर लिखी अपनी किताब में मोहम्मद मुजीब साहब फरमाते हैं, ‘उस मुश्तरिक शहरी तहज़ीब को शहरी होने और शहरी रहने की ज़िद थी। ज़िंदगी सिर्फ़ शहर में मुमकिन थी और जितना बड़ा शहर उतनी ही मुकम्मल ज़िंदगी। यह हो सकता था कि इश्क़ और दीवानगी में कोई शहर से बाहर निकल जाए। क़ुदरत से क़रीब होने के शौक में शायद ही कोई ऐसा करता, क्योंकि यह मानी हुई बात थी कि क़ुदरत की तक़मील शहर में होती है और शहर के बाहर क़ुदरत की कोई जानी पहचानी शक्ल नज़र नहीं आती।’तो ऐसे ही कितने शहरों में कितनी बार रहते हुए शहर फ़ैज़ाबाद की अमीरन ने जब लखनऊ से उमराव जान ‘अदा’ नाम से अपनी ज़िंदगी का सफर शुरू किया, तो शहर-दर-शहर होते हुए वह भी ज़िंदगी की शाम में शाम-ए-अवध से सुबह-ए-बनारस आई थी। वही उमराव जान, जो एक उर्दू उपन्यास है और जिसे उर्दू के नाविलनिगार मिर्जा हादी रुस्वा ने लिखा है और जो पहली बार सन् 1899 में छपा था। कहा जाता है कि जब मिर्ज़ा हादी रुस्वा अमीरन से उमराव जान बन उमराव से लखनऊ में मिले, तो उन्होंने स्वयं ज़िंदगी की पूरी कहानी रुस्वा साहब को बताई थी। हालाँकि उर्दू अदब कुछ आलोचकों का मानना है कि असल में कोई उमराव जान थी ही नहीं, यह तो लेखक की कल्पना मात्र है। लेकिन यह ख़ाकसार जब शहर बनारस में रह रहा था, तो पता चला कि मिर्ज़ा हादी रुस्वा के उपन्यास की नायिका का इंतकाल बनारस में हुआ था! कहते हैं ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर उमराव जान बिल्कुल अकेली हो गई थीं। तकरीबन सन् 1928 में उन्होंने शहर बनारस का रुख किया। चौक क्षेत्र के गोविंदपुरा मोहल्ले में उन्हें पनाह मिली और इसी शहर में गुमनाम ज़िंदगी बसर हुए 26 दिसंबर, 1937 को उन्होंने आख़िरी साँस ली।
भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित जो शहर बनारस है, उसके बाहर एक ग़ैर मुल्क पाकिस्तान के शहर कराची में बसे बनारस का जिक्र हम कर चुक हैं, लेकिन इन दोनों देशों से दूर यूरोपीय देश ब्रिटेन में जो बनारस है, उसके बारे में कभी सोचा है आपने? लंदन से तकरीबन साठ किलोमीटर दूर चिल्टर्न की पहाड़ियों के पास स्टोक रो नाम के एक छोटे से गाँव में एक कुआँ है जिसका नाम है महाराजा का कुआँ, जिसे काशी नरेश ईश्वरी नारायण सिंह ने बनवाया था। काशी नरेश के इस कुएँ पर ‘डिपिंग इंटू द वेल्स’ नाम से किताब लिखने वाली एंजेला स्पेंसर हार्पर के मुताबिक इस कुएँ की कहानी 1857 के सिपाहीविद्रोह के समय से शुरू होती है। उस समय अंग्रेज़ों की सेना में एक अफ़सर थे एडवर्ड एंडरसन रीड और ग़दर को कुचलने में साथ दे रहे थे काशी नरेश। एडवर्ड और काशी नरेश दोनों साथ लड़े और दोनों की दोस्ती हो गई। जब दोस्ती हो गई, तो दुःख-सुख साझा करने के क्रम में एडवर्ड ने काशी नरेश को बताया कि इंग्लैंड के उसके गाँव में पानी की भारी कमी है और गर्मियों में पानी के लिए लोगों के बीच मारपीट की नौबत आम बात है। उसके बाद ईश्वरी नारायण सिंह ने एडवर्ड के गाँव में कुआँ खुदवाने/बनवाने के लिए सारी राशि दी और एडवर्ड ने इंग्लैंड लौटकर अपने गाँव में कुआँ खुदवाया। कुआँ जब बनकर तैयार हो गया तो उसका नाम रखा गया-महाराजा का कुआँ। बकौल एंजेला स्पेंसर हार्पर के, आज भी सही-सलामत वह कुआँ 368 फीट गहरा यानी कुतुबमीनार की ऊँचासे से भी अधिक गहरा है। कुतुबमीनार की ऊँचाई 238 फीट ही है। आधुनिक से अब उत्तर-आधुनिक हो चुके ब्रिटेन में अब इस कुएँ का इस्तेमाल लोग नहीं करते, लेकिन इस कुएँ के बग़ैर जब डूब मरने के लिए वहाँ चुल्लू भर पानी भी नहीं था, तब इस कुएँ का इस्तेमाल साहब बहादुर के ख़ानदान के लोग करते थे और कहते थे कि पानी की बाल्टी खींचकर निकालने में तकरीबन दस मिनट लग जाते थे। इस संदर्भ में पता चला कि काशी नरेश ईश्वरी नारायण सिंह की पत्नी ने अपने पति द्वारा निर्मित इंग्लैंड के कुएँ की याद में बनारस में भी ठीक वैसा ही एक कुआँ सन् 1891 में बनवाया था, जो काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पास ही नगवाँ इलाक़े में है।
जिस देश में अयोध्या प्रसाद, मथुरादास, गया सिंह, गोकुलनाथ, काशीनाथ, काशीप्रसाद, बनारसी सिंह होते हों और चाहे बनारस के साक़िन हों/ रहे हों या बनारस से महज़ वाबस्तगी भर हो, नाम भले शकेब, नज़ीर, हफ़ीज, वासिफ़, बेख़ुद, राशिद और आसिफ़ हो, सरनेम सबका बनारसी है। सबके सब खाँटी बनारसी हैं। बनारसी तो नामवर सिंह भी थे, जो बनारस में रह तो नहीं पाए, लेकिन बनारस उनके भीतर ता-उम्र रहा। बकौल विश्वनाथ मुखर्जी, ‘बनारस में पैदा होने या पैदा होकर मर जाने से बनारसी कहलाने का हक हासिल नहीं होता। इस प्रकार के अनेक बनारसी नित्य पैदा होते हैं और मरते हैं। क्या वे सभी बनारसी हैं? कभी नहीं। बनारस में पैदा होना, बनारस में आकर बस जाना या बनारसी बोली सीख लेना भी बनारसी होने का पक्का सबूत नहीं है। आप कुछ ही दिन के अभ्यास से लंदनवी, न्यूयार्की, बंबईया या कलकतिया भले ही बन जाएँ, परंतु बनारसी बन सकना कठिन होगा। बनारसियों के दिल में इस बात की बड़ी कसक रहती है कि बड़े-बड़े विदेशी नेता जब कभी बनारस आते हैं, तब इतना पर्दानशीन होकर चलते हैं जैसे मुगलकाल में बेगमें जाती थीं। बनारस आकर अगर बनारसी गुरुओं की संगत नहीं की, भाँग नहीं छाना, साफा नहीं लगाया, गहरेबाज़ी नहीं की और नाव पर सैर नहीं की तो बनारस नहीं देखा। लंबी-चौड़ी गर्द से ढँकी सड़कों पर क्या रखा है? टूटे-फूटे घाटों के किनारे ऊँचे महलों में क्या रखा है? पुलिस की संगीनों के साये के नीचे आनंद क्या मिलेगा? जब तक उस परिधि के बाहर आकर साधारण बनारसियों से घुल-मिलकर उनसे परिचय प्राप्त नहीं करेगा, बनारस क्या, एक बनारसी को भी कोई समझ नहीं सकेगा।’ अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने कहा था, ‘वाराणसी इतिहास से भी अधिक प्राचीन है। परंपरा की दृष्टि से भी अतिशय प्राचीन है। मिथकों से भी कही अधिक प्राचीन है और यदि तीनों (इतिहास, परंपरा और मिथक) को एक साथ रखा जाए तो यह उनसे दोगुनी प्राचीन हैं।’मगर आधुनिकता ही जैसे सभ्यता का चरम हो और प्राचीनता समकालीनता का विरोधी, शायद इसलिए बनारस को कभी पेरिस, कभी टोकियो, कभी ओसाका बनाने की बात आती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि सबसे बड़ा दुःख है ‘न समझा जाना’। कोई शहर किसी और शहर की तरह होकर ही अच्छा होगा, कोई मनुष्य किसी और मनुष्य की तरह होकर ही अच्छा होगा, यह सोच आज के बनारस को न समझे जाने के दुःख से क्या कम बड़ा दुःख है!
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प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, पंजाब केंद्रीय वि.वि., मानसा रोड, बठिंडा-15100, फोन-963428288
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