1935 में जर्मन और यहूदी मूल के एक अमेरिकी पत्रकार, ‘मिल्टन मेयर‘ जर्मनी गए थे, हिटलर का साक्षात्कार लेने के मकसद से। “मैं इस राक्षसी शख़्स, इस ‘नाज़ी’ को देखना चाहता था। मैं उससे बात करना चाहता था, और उसे सुनना चाहता था। मैं उसे समझने की कोशिश करना चाहता था। आख़िर हम दोनों इंसान थे, मैं और वह।”
इसमें वे कई कोशिशों और पहुँच के बावज़ूद असफल रहे, लेकिन जर्मनी में जो उन्होंने देखा, उससे वे इतना घबड़ा गए, कि उन्हें समझ आया कि उन्हें हिटलर से बात करने की ज़रूरत नहीं थी। “मैंने उन जर्मन लोगों को देखा, उन लोगों को जिन्हें मैं तब जानता था जब लड़कपन में जर्मनी-भ्रमण पर आता था, और पहली बार मुझे महसूस हुआ कि नाज़ीवाद एक जन-आंदोलन था; और यह कोई―कुछ क्रूर लोगों का लाखों असहाय लोगों पर―अत्याचार नहीं था!”
तो इस बार जर्मनी में, उन्होंने दस साधारण जर्मनों का साक्षात्कार लिया– एक दर्ज़ी, एक छात्र, एक बेकर, एक टीचर, एक पुलिसमैन, एक बिल-कलेक्टर, आदि―का, यह समझने के लिए कि किस तरह से उस देश में नाज़ी आंदोलन का इतना व्यापक विस्तार हुआ..
उन्हीं साक्षात्कारों को समेटे यह किताब बनी ‘They thought they were free‘.. और इस किताब का तेरहवाँ चैप्टर है ‘But then it was too late’.. जिसका अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है. अनुवाद किया है इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तृतीय वर्ष के छात्र तरुण त्रिपाठी ने-
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“पर बहुत देर हो चुकी थी तब”
“एक चीज़ जो कोई भी ध्यान देता नहीं दिखा”, मेरे एक साथी, एक फ़िलोलॉजिस्ट ने कहा, “वह थी लगातार चौड़ी होती खाई, 1933 के बाद, यहाँ की सरकार और इसके लोगों के बीच की खाई। ज़रा सोचें आप, कि यहाँ जर्मनी में कैसे यह इतनी बड़ी दरार शुरू हुई! और यह हमेशा बढ़ती ही गयी। आप जानते हैं, लोगों को उनकी सरकार के करीब नहीं ला देता महज़ उन्हें बता देना―कि यह लोगों की सरकार है, यह एक सच्चा लोकतंत्र है―या उनका नागरिक सुरक्षा में भर्ती होना, या उनका वोट करना भी। इन सब की बहुत कम, असल में नगण्य, भूमिका है यह समझने में कि कोई शासन कर रहा है।
“यहाँ क्या हुआ कि लोगों को, थोड़ा-थोड़ा करके, अभ्यस्त बनाया गया, एक क्रमिक प्रक्रिया के तहत, यकायक शासित होने की अवस्था के लिए; गुप्त रूप से लिए गए फ़ैसलों को ग्रहण कर लेने की अवस्था में; यह मान लेने की अवस्था में कि ‘स्थिति इतनी जटिल है कि सरकार को ऐसी सूचनाओं और जानकारियों पर काम करना पड़ रहा है जो लोगों की समझ में नहीं आ सकतीं, या वे इतनी ख़तरनाक हैं कि, हालाँकि लोगों के ये समझ में नहीं आ पाएंगी, फिर भी उन्हें ज़ारी नहीं किया जा सकता, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए..’। और उन लोगों का हिटलर को अपनी पहचान से जोड़ना, उस में उनके भरोसे, ने इस खाई के इस विस्तार को और आसान बनाया; और उन लोगों को आश्वस्त रखा जो अन्यथा स्थिति में चिंतित हो गए होते।
सरकार का उसके लोगों से यह अलगाव, उस खाई का यह विस्तरीकरण, इतने चेतनातीत और आहिस्ता से हुआ, हर कदम आता एक चोला पहन कर(शायद जानबूझ कर न भी हो), किसी तात्कालिक आपात कार्रवाई के रूप में, या शुद्ध देशभक्ति से जुड़े हुए या सच्चे समाजवादी उद्देश्य से भरे हुए कदम के रूप में। और सारी विपत्तियाँ और सुधार(वास्तविक सुधार भी) छेंक कर इस तरह तारी हो गए थे लोगों की चेतना पर, कि लोगों ने देखा ही नहीं इन सब के तले चल रही मंद गति, सरकार के दूरवर्ती होते जाने की पूरी प्रक्रिया की।
“आप मुझे बेहतर समझेंगे जब मैं बताऊँ कि मेरी पूरी जीवनचर्या एक उच्च मध्यवर्गीय जर्मन की थी। बस इसी में मुझे जीना था। मैं एक स्कॉलर था, एक विशेषज्ञ। तभी, अचानक, मुझे एक बिल्कुल नए काम में लगा दिया गया, कि विश्वविद्यालय ही पूरी एक नई स्थिति में ला दिया गया था, बैठकें, कॉन्फ्रेन्सेज़, साक्षात्कार, समारोह, और सबसे ऊपर कागज़-पत्तर भरना, रिपोर्टें, बिबलियोग्राफ़ियाँ, सूचियाँ, प्रश्नावलियाँ तैयार करना। और सबसे बड़ी बात उस समाज में जो माँगें थीं, कि लोगों को ऐसे-ऐसे कामों में लगना था, लोगों से ऐसे-ऐसे कामों में लग जाने की अपेक्षा थी, जो काम थे ही नहीं या महत्वपूर्ण नहीं ही थे इसके पहले। ये सब कुछ बिल्कुल नीरस और निरर्थक था, असल में, पर उसके अपने मन के कामों से ज़रूरी बन कर, आदमी की पूरी ऊर्जा खा जाती थीं ये चीजें। आप पाएंगे कि कितना आसान था, तब, मूलभूत चीजों के बारे में न सोचना। किसी के पास वक़्त ही नहीं था।”
मैंने कहा, “मेरे एक दोस्त बेकर के भी ऐसे ही शब्द थे। ‘किसी को समय ही नहीं था सोचने का। इतना सबकुछ हो रहा था!'”
“आपका वह बेकर दोस्त सही कह रहा था,” मेरे इस साथी ने जारी रखा, “ये तानाशाही, और इसके आने की पूरी प्रक्रिया, दरअसल डाइवर्टिंग थी। इस चीज़ ने उन लोगों को, जो वैसे भी नहीं ही सोचते, उन लोगों को एक बहाना दिया नहीं सोचने का। मैं उन छोटे लोगों के बारे में नहीं बोल रहा हूँ, आपके उस बेकर दोस्त और उन लोगों के बारे में नहीं; मैं अपने संग के लोगों और ख़ुद के बारे में, सुशिक्षित लोगों के बारे में बोल रहा हूँ। हम में से अधिकतर मूलभूत चीजों के बारे में नहीं सोचना चाहते थे और न कभी सोचे थे। हमें कोई ज़रूरत ही नहीं थी। नाज़ीवाद ने हमें सोचने के लिए कुछ भयानक आधारभूत बातें दीं―हम साधारण लोग थे―और अपने आप को हमने उन बदलावों और विपत्तियों के बीच इतना व्यस्त रखा और इतने मुग्ध होते रहे, हाँ, मोहित होते रहे ‘राष्ट्र के शत्रुओं’ के षड्यंत्र में, कि हमारे पास वक़्त ही नहीं था इन भयावह चीजों के बारे में सोचने का, जो हमारे आस-पास बढ़ी जा रही थीं धीरे-धीरे करके। अनजाने में, मुझे लगता है, हम कृतज्ञ थे। सोचना कौन चाहता है?
“इस प्रक्रिया के दौरान जीना इसे बिल्कुल भी नोटिस भी ना कर पाना है―मेरा विश्वास मानिये―जब तक कि किसी के पास एक बहुत ऊँचे स्तर की राजनीतिक जागरूकता, तीक्ष्णता न हो, जितना हमें कभी भी अवसर मिला हो विकसित करने का, उससे कहीं ऊंचे स्तर की। हर कदम इतना सूक्ष्म था, इतना ग़ैर-पारिणामिक, इतने अच्छे से समझाया गया हुआ, या कुछ अवसरों पर, खेद प्रकट किया हुआ, कि जब तक कि कोई शुरुआत से ही बिल्कुल निर्लिप्त न रहा हो पूरी प्रक्रिया से, जब तक कि कोई समझता न रहा हो इन सारी चीजों के पीछे का सिद्धांत, ये सारे ‘छोटे फ़ैसले’ जिन्हें कोई भी ‘देशभक्त जर्मन’ नापसंद नहीं कर सकता था, किस स्थिति में एक दिन ढकेल सकते हैं उन्हें; जितना कि एक किसान देख पाता है अपने खेत में बढ़ते हुए मक्के को, शायद इस स्थिति का विकसित होना भी उतना ही देख सकता था कोई। एक दिन यह उसके सिर के ऊपर चला जाता है।
“इसे कैसे रोका जा सकता है, साधारण लोगों में, या सुशिक्षित साधारण लोगों में भी? सच बताऊँ मैं नहीं जानता। मुझे अब भी समझ में नहीं आता। कई, कई बार जबसे यह सब हुआ है, मैंने महान सूक्तियों के उस जोड़े―Principiis obsta और Finem respice―पर चिंतन किया है, कि ‘आरंभ का प्रतिरोध करो’ और ‘अंत पर ध्यान दो’। लेकिन किसी को प्रतिरोध करने के लिए ज़रूरी है ना कि उसे उस अंत का कुछ पता हो, या उस आरंभ का भी कुछ देखा हो! एक आदमी को अंत का पूर्वानुमान होना चाहिए ना, स्पष्टता और निश्चितता से, और कैसे ये सब होना है, आम लोगों के द्वारा, या सुशिक्षित आम लोगों के द्वारा भी? चीज़ें ‘हो सकता है’ रहीं हो। और हर कोई छोड़ देता है उस ‘हो सकने’ पर।
“आपके वे ‘छोटे लोग’, आपके नाज़ी दोस्त, मूल रूप से राष्ट्रीय समाजवाद के विरुद्ध नहीं थे। मेरे जैसे लोग, जो थे, ज़्यादे अपराधी हैं इसके, इसलिए नहीं कि हम जानते बेहतर थे (यह कहना कुछ ज़्यादा ही हो जाएगा) बल्कि इसलिए कि हम अनुभव बेहतर करते थे। पादरी ‘निमोलर’ ने मेरे ही जैसे हज़ारों-हज़ारों लोगों की बात बोली जब उन्होंने कहा (बड़े संकोच से अपने बारे में) कि जब नाज़ियों ने साम्यवादियों पर हमला किया, वे थोड़ा सा असहज हुए, लेकिन, आख़िरकार, वे साम्यवादी नहीं थे, और इसलिए उन्होंने कुछ नहीं किया; और तब नाज़ियों ने समाजवादियों पर हमला किया, और उन्हें थोड़ा और असहज महसूस हुआ, लेकिन, जो भी हो, वे समाजवादी नहीं थे, और इसलिए उन्होंने कुछ नहीं किया; और तब स्कूलों पर, प्रेस पर, यहूदियों पर, और अन्य चीजों पर, और हर बार वे थोड़ा और असहज हुए, पर फिर भी उन्होंने कुछ नहीं किया। और फिर उन्होंने चर्च पर हमला किया, और वे पादरी थे, और उन्होंने कुछ किया―पर बहुत देर हो चुकी थी तब”
“हाँ”, मैंने कहा।
“आप देखें”, मेरे साथी ने जारी रखा, “कोई ठीक से समझ नहीं पाता कहाँ या कैसे जाया जाए। विश्वास मानिये, सच में। हर कदम, हर वाक़या पिछले वाले से बुरा है, लेकिन बस थोड़ा सा बुरा है। आप अगले और उसके अगले वाले के लिए रुके रहते हैं। आप किसी एक बड़े झटका-शुदा वाक़िये का इंतज़ार करते हैं, सोचते हुए कि दूसरे लोग, जब ऐसा झटका आएगा, तो आपके साथ उतर आएँगे किसी तरह इसे रोकने में। आप कुछ करना नहीं चाहते, बल्कि बात भी नहीं करना चाहते, अकेले; आप अपने आम ‘तौर’ से निकल कर कुछ हलचल नहीं पैदा करना चाहते। क्यों नहीं?―चूँकि आपको आदत नहीं है ऐसा करने की। और ये सिर्फ़ डर नहीं है, अकेले खड़े होने का डर, जो आपको रोके है; ये एक साधारण सी अनिश्चितता भी है।
“अनिश्चितता एक बेहद महत्वपूर्ण घटक है, और यह घटने की बजाय समय के साथ, बढ़ती जाती है। बाहर, उन गलियों में, उस आम समाज में, ‘हर व्यक्ति’ ख़ुश है। कोई विरोध नहीं सुनाई देता है, और निश्चित ही कोई दिखाई नहीं देता। आप जानते हैं, फ्रांस या इटली में, दीवारों और चारदिवारियों पर नारे लिक्खे मिलेंगे सरकार के ख़िलाफ़; जर्मनी में, महान शहरों के बाहर, शायद, यह भी नहीं है। विश्वविद्यालय समाज में, आपके अपने समाज में, आप अपने साथियों से बात करते हैं निजी रूप से, उनमें से कुछ निश्चित रूप से महसूस करते हैं आपकी ही तरह; लेकिन वे कहते क्या हैं? वे कहते हैं, ‘इतना बुरा नहीं है ये’ या ‘तुम देख रहे हो ऐसे’ या ‘तुम अलार्मिस्ट हो, भय फैलाने वाले हो’।
“और आप अलार्मिस्ट हैं। आप कह रहे हैं कि ‘यह’ हमें ‘इस’ स्थिति में ले जा सकता है, और आप इसे साबित नहीं कर सकते। यही है वह आरंभ, हाँ; पर कैसे जानेंगे आप निश्चितता से, जब आपको अंत पता ही नहीं होगा, और कैसे जान भी या अनुमान भी कर पाएंगे आप उस अंत का? एक तरफ़, आपके दुश्मन, वहाँ का क़ानून, वो हुकूमत, वो पार्टी, डराती-धमकाती है आपको। दूसरी तरफ़, आपके साथी छी करते हैं आप पर, निराशावादी या विक्षिप्त तक कह डालते हैं आपको। आप अपने उन सबसे करीबी दोस्तों के साथ अकेले पड़ जाते हैं, जो स्वाभाविक रूप से, ऐसे लोग हैं जो आपकी ही तरह सोचते हैं।
“लेकिन अब आपके दोस्त बहुत कम हैं। कुछ लोग कहीं सो पड़े हैं या अपने आपको अपने काम में डुबा लिए हैं। अब आपको उतने दोस्त नहीं दिखते हैं जितने सभाओं और बैठकों में दिखते थे। अनौपचारिक समूह छोटे होते जाते हैं, छोटी संस्थाओं में उपस्थितियाँ कम होती जाती हैं, और संस्थाएँ ख़ुद ही सिकुड़ती जाती हैं। अब, अपने सबसे पुराने दोस्तों की छोटी सी महफ़िल में, आपको लगता है कि आप अपने आप से ही बात कर रहे हैं, कि आप चीज़ों की वास्तविकता से अलग-थलग हो गए हैं। यह आपके आत्मविश्वास को और कमज़ोर करता जाता है, और आपके लिए भयकारक की तरह काम करता है―किस चीज़ से? यह तो अब हर पल स्पष्ट होता जाता है, कि अगर आप कुछ करने जा रहे हैं, आपको पक्का एक ऐसा मौका चाहिए कुछ करने का, और तब आप स्वाभाविक रूप से एक हंगामा पैदा करने वाले हो जाते हैं। इसलिए आप इंतज़ार करते हैं, और बस इंतज़ार करते हैं।
“लेकिन वह एक झटका-शुदा अवसर, जब दसों या सैकड़ों या हज़ारों लोग आपके साथ उतर आएंगे, कभी नहीं आता है। यही वो मुश्किल है। अगर इस पूरी हुकूमत का अंतिम और निकृष्टतम कृत्य इसके प्रथम और लघुतम कृत्य के तुरंत बाद आ गया होता, हज़ारों, हाँ, लाखों लोग पर्याप्त रूप से दहल गए होते―अगर, कहा जाए, कि 1943 का यहूदियों को गैस चैम्बरों में डाला जाना 1933 के ग़ैर-यहूदियों की दुकानों की खिड़कियों पर ‘जर्मन फ़र्म’ के स्टिकर्स लगाने के तुरंत बाद हुआ होता..। लेकिन निस्संदेह चीज़ें इस तरह से नहीं होती हैं। इनके बीच आते हैं वे सारे सैंकड़ों कदम, उनमें से कुछ बिल्कुल अदृश्य, हर कदम आपको तैयार करता कि आप अगले वाले से अचंभित न हों। ‘स्टेप सी’ बहुत बुरा नहीं होता ‘स्टेप बी’ से, और अगर आपने ‘स्टेप बी’ पर कोई आवाज़ नहीं रखी, तो ‘स्टेप सी’ पर क्यों रखना चाहिए? और इसी तरह फिर ‘स्टेप डी’ पर भी।
“और एक दिन, बहुत देर हो चुकी होती है, आपके सिद्धांत, अगर आप उनके बारे में कभी सचेत रहे हैं, सब आपके ऊपर टूट पड़ते हैं। स्व-छल का वह बोझ इतना भारी हो चुका है, और कुछ छोटी घटनाएं―मेरे प्रकरण में मेरा छोटा लड़का, एक शिशु से अभी थोड़ा ही बड़ा होगा, कह रहा ‘यहूदी की तरह का सूअर’―सबकुछ बिखेर देती हैं एकाएक, और आप देखते हैं कि सारा कुछ, सारा कुछ बदल चुका है, और पूरी तरह से बदल चुका है आपकी नाक के नीचे। वह दुनिया जिसमें आप रहते हैं―आपका राष्ट्र, आपके लोग―बिल्कुल भी वह दुनिया नहीं है जिसमें आपने जन्म लिया था। वे स्वरूप सारे वही हैं, सभी अनछुए, सभी आश्वस्त करने वाले, वे घर, वे दुकानें, वे काम-काज, वे भोजनकाल, वे भेंटें, वे कार्यक्रम, वह सिनेमा, वो छुट्टियाँ, सब। लेकिन वह भावना, जिसे आपने कभी ध्यान नहीं दिया क्योंकि आप चीजों की पहचान उसके स्वरूप से करने की आजीवन ग़लती करते रहे, बदल चुकी है। अब आप घृणा और भय से भरे संसार में रहते हैं, और जो लोग घृणा करते और डरते हैं वे ख़ुद भी इसे जानते तक नहीं; जब हर कोई बदल चुका हो, कोई भी बदला नहीं होता। अब आप एक ऐसी व्यवस्था के शासन में रहते हैं जो ईश्वर के प्रति भी जवाबदेह नहीं है। शुरुआत में हो सकता है कि ख़ुद इस शासन-व्यवस्था ने ही ऐसा न चाहा हो, लेकिन अपने आप को बनाये रखने के लिए ही, यह मजबूर होकर बढ़ चली इस रास्ते पर।
“आप ख़ुद ही बहुत आगे आ गए हैं इस रास्ते पर। ज़िंदगी एक निरंतर प्रक्रिया है, एक बहाव, कृत्यों और घटनाओं का कोई अनुक्रम नहीं है। यह एक नए स्तर पर बह आयी है, आपको लिए हुए अपने साथ, बिना आपके किसी प्रयास के। इस नए स्तर पर जहाँ आप रहते हैं, आप दिन पर दिन अधिक सहजता-पूर्ण होते जा रहे हैं, नए सिद्धांतों, नए आदर्शों के साथ। आपने उन चीज़ों को स्वीकार कर लिया है जो आपने नहीं स्वीकारा होता शायद पाँच साल पहले, एक साल पहले, चीज़ें जिनकी आपके पिता, जर्मनी में रहकर भी, कल्पना भी नहीं कर सकते थे।
“अचानक से यह सब उतर आता है आप पर, सब एकबारगी। आपको दिखता हैं आप क्या हो गए हैं, आपने क्या कर दिया है, या और सटीक कहें तो, आपने क्या नहीं किया है(कि यही तो हम सब से अपेक्षित और इच्छित था: कि हम कुछ न करें)। आप याद करते हैं विश्वविद्यालय में अपने विभाग की वे शुरुआती बैठकें जब, अगर एक खड़ा होता, दूसरे भी खड़े हो जाते, शायद, लेकिन कोई भी खड़ा नहीं हुआ। कोई छोटा सा मामला, इस आदमी या उस आदमी को काम पर रखने का मामला, और आपने इस आदमी को रख लिया उस आदमी के बजाय। आपको अब सबकुछ याद आता है, और आपका हृदय फूट पड़ता है। बहुत देर हो चुकी है। आप समझौतों में इतनी दूर चले आये हैं, कि अब यह सब दुरुस्ती से परे है, सुधारातीत है।
“फिर क्या? फिर आपको अपने आप को गोली मार लेनी चाहिए। कुछ ने कर लिया। या अपने सिद्धांतों को ‘पुनः-व्यवस्थित’ कर लेना चाहिए। कईयों ने कोशिश की, और कुछ, मुझे लगता है, सफल हो गए; मैं नहीं, हालाँकि। या बाकी बची ज़िंदगी इस शर्मिंदगी के साथ जीना सीख लेना चाहिए। यह आख़िरी वाला सबसे करीब है, इन परिस्थितियों में, हीरोइज़्म के: शर्मिंदगी। कई जर्मन यह ‘नीच प्रकार के’ हीरो हो गए हैं, कहीं ज़्यादे, मुझे लगता है, इस संसार की जानकारी से या इसके जानकारी की इच्छा से, कहीं ज़्यादे।”
मैं कुछ नहीं बोला। मैं कुछ सोच भी नहीं पाया कहने को।
“आपको बताता हूँ मैं”, मेरा साथी बोलता रहा, “एक शख़्स, एक जज के बारे में, लाइपत्सिग शहर में। वे ‘नाज़ी’ नहीं थे, थे तो बस नाम के लिए, लेकिन निश्चित रूप से वे एंटी-‘नाज़ी’ भी नहीं थे। वे सिर्फ़― एक जज थे। सन ’42 या ’43 में, ’43 की शुरुआत में, मेरे ख़याल से, एक यहूदी का कोई केस हुआ था उनके सामने, किसी ‘आर्यन’ औरत के साथ उसके संबंध से जुड़ा हुआ कुछ केस था। तो यह ‘जातिगत आघात’ था, एक ऐसी चीज़ जिस पर यहाँ की ‘पार्टी’ विशेष तौर पर उतावली थी दंड देने को। अदालत में, हालाँकि, इस केस में उस जज के पास उसे ‘ग़ैर-जातिगत’ अपराधी सिद्ध कर के लंबे समय के लिए किसी साधारण जेल में भेज देने की शक्ति थी, और तब वह ‘पार्टी’ के उस उपक्रम से बच जाता, जिसका अर्थ कॉन्सेंटरेशन कैम्प होता है या, बहुत संभव है, निर्वासन, और मौत। परंतु ‘ग़ैर-जातिगत’ अभियोग पर वह व्यक्ति निर्दोष था, उस जज के अनुसार, और इसलिए, एक सम्माननीय जज होने के चलते, उन्होंने उसे बरी कर दिया। फिर क्या था, जैसे ही वह यहूदी अदालत के बाहर आया, ‘पार्टी’ ने उसे दबोच लिया।”
“और वो जज?”
“हाँ, वो जज। वे इस केस को अपनी अंतरात्मा से निकाल ही नहीं पाए―एक केस जिसमें, ध्यान रखो, उन्होंने एक निर्दोष आदमी को बरी किया था। उन्होंने सोचा कि उन्हें उसे अपराधी सिद्ध कर देना चाहिए था, और ‘पार्टी’ से उसे बचा लेना चाहिए था, लेकिन वे एक निर्दोष व्यक्ति को अपराधी कैसे सिद्ध कर देते? ये चीज़ें उन्हें खाती रहीं, और-और खाती रहीं, और उन्हें इसके बारे में लोगों से बात करनी पड़ी, पहले अपने परिवार से, फिर अपने दोस्तों से, और फिर अन्य परिचितों से। (इसी प्रकार मैं भी जाना इसके बारे में.) सन ’44 की उस क्रांति के बाद ‘पार्टी’ ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। उसके बाद, मुझे नहीं पता।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“एक बार जब वह जंग शुरू हो गयी”, मेरे साथी ने जारी रखा, “प्रतिरोध, विरोध, आलोचना, निंदा, ये सब अपने साथ सबसे बड़े दंड की संयोजित संभावना लिए रहते थे। उत्साह की केवल कमी होना, या इसे केवल पब्लिक में अभिव्यक्त न कर पाना, ‘पराजयवादी’ हो जाना था। आपको लगता था कि एक लिस्ट है जिसमें उन सारे लोगों का नाम है जिनसे बाद में निपटारा किया जाएगा, जीत के बाद। गोबेल्स बहुत चालाक था, यहाँ भी। वह हमेशा एक ‘विजय उत्सव’ का वादा करता था, उन लोगों का हिसाब करने के लिए जिन्हें लगता था कि उनके ‘विश्वासघाती रवैये’ का अवलोकन नहीं किया गया है। और गोबेल्स सच में यही करने ही वाला था, यह केवल प्रोपेगैंडा नहीं था। और यह उन सारी अनिश्चितताओं का अंत करने के लिए काफ़ी था।
“एक बार जब वह जंग शुरू हो गयी, सरकार उसे जीतने के लिए जो भी ज़रूरत पड़े कुछ भी कर सकती थी, तो ऐसा ही उस ‘यहूदी समस्या के अंतिम समाधान’ के साथ भी था, जिसके बारे में नाज़ी हमेशा बात तो करते थे लेकिन कभी वह उपक्रम करने की हिम्मत नहीं हुई थी, ख़ुद नाजियों की भी, जब तक कि जंग और उसकी ज़रूरतों ने उन्हें यह सूचित नहीं किया कि वे इस पर काम कर सकते हैं। बाहर के लोग जिन्होंने सोचा कि हिटलर के विरुद्ध युद्ध से यहूदियों की मदद होगी ग़लत थे। और वे जर्मनी के लोग जो, जंग शुरू होने के बाद, अब भी शिकायत करने, विरोध करने, और प्रतिरोध करने के बारे में सोचते थे, वे जर्मनी के युद्ध हार जाने की बाज़ी लगा रहे थे। यह एक बड़ी बाज़ी थी। अधिक लोग नहीं कर पाए…
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