Quantcast
Channel: जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
Viewing all articles
Browse latest Browse all 1483

‘माउथ ऑर्गन’अपनी धुन गुनगुना रहा है

$
0
0

सुशोभित के लेखन की अपनी ख़ास शैली है जिसके कारण हज़ारों लोग उनको फ़ेसबुक पर रोज़ पढ़ते हैं। उनकी किताब ‘माउथ ऑर्गन’ का गद्य भी बहुत सम्मोहक है। मन की यात्राओं के इस गद्य पुस्तक की काव्यात्मक समीक्षा अपनी  खास शैली में यतीश कुमार ने की है- मॉडरेटर

======================

माउथ ऑर्गन-सुशोभित
वह कालयात्री है
स्मृतियाँ रह-रह कर
उसकी नज़रों में
धुँधलाती हुई चमकती है
 
संस्मरण न लिखो
तो मन पर बोझ सा रहता है
नशे के खुमार-सा
जिसे न उतारा जाए
तो रचनात्मकता भोथराकर
सर्फ़िंग मोड में चली जाती है
स्मृतियाँ रेत-सा चस्पा है
उसने कई देह धरे किस्सागोई के लिए
पर शल्कों से चस्पा रेत
इतनी आसानी से नहीं छूटता
निजात शब्दों के लेप में
ढूँढ लिया है उसने
 
अब सारे रेत
लेप में चिपक रहे हैं
और फिर
दास्तान,आपबीती,कल्पना वाचन बड़बड़ाते हुए
सफ्हों पर अपनी जगह ढूँढते जा रहे हैं
और यह सब देख
माउथ ऑर्गन अपनी धुन गुनगुना रहा है
वो आँखे बंद करता है
तो ठुमरी और ग़ज़ल
एक साथ अलग कानों से सुन लेता है
वो शब्दों के आपसी प्रेम और तकरार में
संगीत ढूँढ लेता है
और संगीत की तरंगें तो
बंद आँखों से भी दिखती हैं उसे
मासूम नज़रों से उसके
न बच पाई
बेमोल फुग्गे की अदृश्य जादुई शक्ति
जिसका धागा अभी-अभी
एक बच्चे के हाथ से फिसल गया
और जिसने रोक दिया है
हाँफते शहर का यातायात
उस फुग्गे का उस बच्चे तक वापस आना
इस कायनात की सबसे सुखद घटना है
उसके लिए
जिसे कोई कैमरा क़ैद नहीं कर सकता
उसे कवि की नज़र में क़ैद होना नसीब है
वो देख सकता है
चोकलेट बार से निकलता संगीत
जिसे दुनिया माउथ ऑर्गन कहती है
 
वह उस छोटी सी जादुई साज़ से
सांता की सर्वव्यापी धुन
सुनाने की कोशिश करता है
उसे पता है उस धुन में
उम्मीद और दुआओं का मिश्रित असर है
ठिठलाते बच्चे की ख़ुशी को देखते ही
उसके अंदर का सांता मुस्करा उठता है
मुस्कुराहट का संचय ही
उसका ध्येय और प्राप्ति है
 
वो चर्च देखने निकलता है
पर उसे सफ़ेद चर्च के सामने बैठी
काली सिलाई मशीन
अपनी ओर खींच लेती है
वो इतनी आसानी से
जूता पोलिश को अब्राहम लिंकन से जोड़ता है
जितनी आसानी से खिचड़ी को विवेकानंद से
कुल मिलाकर अल्हदा है-यह ख़ुदरंग
वो निर्जीव में सजीवता देखता है
उसका थोड़ा पागल होना
उसकी नेज़े सी नज़र का पैनापन है
कि वो चीजों में
उसका कट मॉडल तैयार करता है
सिलाई मशीन,मोमजामे,धागों से बनी कलगी
छोटी दुनिया के रहस्य
उसे उस बूढ़े से समझना है
निर्जीव को सजीव बनाने वाली जादूगरी
जिसके हाथों के इशारे पर
यह मशीन नाचती है
और जो भरी दोपहरी
भागती दुनिया से बेख़बर
मोमजामे की छाँव में
इत्मिनान की नींद ले रहा है
और उसकी इस बेख़बरी भरे खर्राटे से
रह-रह कर काँप जाती है
इन्द्र की आसंदी
स्मृति में काले धब्बे……
शायद दाग अच्छे हैं
जामुन-करौंदे के दोने
और संतरे के लेमनचूस में
लेखक की उन्मुक्तता लबालब दिखती है
 
इंदौर उज्जैन भोपाल बम्बई
अनार के कसे दानों से
इन क़िस्सों में
आपस में चिपके हुए है
 
ज़िंदगी की खट्टी मीठी यादों को
खट्टी मीठी चीजों से जोड़ते हुए
वय क्षय गाथा आगे बढ़ती जाती है
धड़कते दिल से किसी का पीठ देखना
वक़्त की घड़ी को उल्टा घुमाने जैसा है
कथावाचक अक्सर अपनी कहानी
कहकर भूल जाता है
और सिर्फ़ सुनने वाले को याद रह जाती है
पिता को बचपन में
आदर्शों वाली कहानी सुनाते देखा था
जैसे-जैसे बड़े हुए
हमारी ही चिंता ने
उनके आदर्शों की किताब चुराई
आज मैं अपनी बेटी को
वही कहानी सुना रहा हूँ
ये सिलसिला ऐसा है
जिसे क्रमशः चलना है
दूसरों की यादों का संग्रहालय बनना
उस दरख्त के कोटर जैसा है
जिसकी सुरंग में आवाज़ें लौटती नहीं
यह एक तरफ़ा संचार है
कितनी गाँठें हैं
बारीक महीन
न गलतीं और न सीझतीं
ज़िंदगी में न घुल पाई है
घबराहट अबतक
और हम हैं कि दाल
समंदर के पानी से पकाने चले हैं
आसमान को आइना दिखाते लैम्प पोस्ट
ज़मीन पर तारों-से टिमटिमाते हैं
नींद के अंधेरे में जाग एक रौशनी है
और हर जागता इंसान एक लैम्प पोस्ट
वो एक चेहरा ही तो है
सूखी अंतड़ी और चेहरा ज़र्द
स्टेशन,बस अड्डे या अस्पताल
सच है चायवाला -हमशक्लों की प्रजाति है
और सच पूछो तो
आदमी का चेहरा उसका जूता है
जबकि मोची आदतन जूते नहीं पहनते
वो चिंतित है
उन स्टेशनों के बारे में सोचकर
जहाँ ट्रेनें रुकती नहीं हैं
नाम हम सबके
पानी से ही लिखे जाते हैं
किसी की उम्र उड़ते बादल-सी
तो किसी कि उम्र नमी जितनी
कुछ नाम किताबों से किए इश्क़ हैं
और कुछ उनपर छोड़े गए बोसे हैं -अजर
ताउम्र छोटी-छोटी बात
छोटी-छोटी चोट
और छोटी-छोटी मौत
ज़िंदगी एक माला बन गई है इन छोटी मुक्ताओं की
 
साँस भी तो अंतराल में ही चलती है
और छोटी-छोटी मृत्यु के
इन्हीं अंतरालों में
जन्म लेता है संस्मरण
बाहर तमाम खटराग और ऊभचूभ
साँकल बनकर खटखटाती रहती है
और भीतर सीने में धड़कनों का
एक कारख़ाना शोर कर रहा होता है
शहर की बौखलाहट
छहों दिन छटपटाती है
और सातवें दिन घुटने टेक देती है
प्रार्थना और प्रायश्चित की शक्ल लिए
कतबा गले में लटकाए
हम मस्जिद,गुरुद्वारे या चर्च में नज़र आते हैं
कोई उखाड़ कर लाया है
तो किसी को लगाना है
कतबे की अजब दास्ताँ
और तख़्त की अजीब लड़ाई
पर लेखक का सरोकार
जीवन की छोटी-छोटी ख़ुशियों से है ।
वह लड़ाई की परछाई में
सोते ख़ुशियों की गिलहरी को
अखरोट बाँटता फिरता है
वह सकारात्मकता का हितैषी है
वह संतोष की कनी टटोलता है
ओस के मोती पिरोता है
पर उसे यह भी पता है
कि धूप खिलते ही मोती गल जाएँगे
उसे इस बात का डर है
और वो अच्छी तरह वाक़िफ़ है
कि रिश्तों की सतहें फिसलन से लिपी हैं
और हरदम उसे पकड़े रहना मुश्किल
समय के साथ
या तो फिसलन मिटती है या फ़ासला
सितारों के कितने आपसी फ़ासले हैं
और तारों के कितने अफ़साने
पर मृत्यु फ़ासलों का अंतिम सच
गिरते तारों का फ़ासला नापना अंतिम मंज़िल
अंतराल की उम्र मापने के लिए
ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण के
कश्मकश को समझना होगा
आपसी रंजिश सिर्फ़ रिश्तों,घरों और शहरों में नहीं होती
बल्कि ये जद्दोजहद तो कायनात में विसरित है
आम और शरीफ़े की सिफ़त पर
ज़िक्र ऐसे करता है कि
ज़िंदगी बीत गई उसी के बाग़ानों में
क़िस्सागोई बतकही से बतरस
क़सीदा फलों पर ऐसे
जैसे रिसर्च का पेपर
काव्यशैली में लिख रहे हों
उसकी कल्पना में
मन कभी पेड़े सा चपटा
तो कभी गोल रसगुल्ले सा रसभरा
दुनिया और मन
एक ही सिक्के के दो पहलू हैं
कवि कहता नहीं महसूस कराता है
उसे हर उस घर के आँगन में
चंद्रमा उतरता दिखता है
जिसने उसके बिम्ब को
अपने भीतर महसूस किया
उस चाँदना को लिए
नींद से लड़ने के बजाय
उससे हारना
दिव्य प्राप्ति है उसकी
देवताओं का दुकूल
फ़रिश्तों की पैरहन
महक का मीज़ान
एक गंध और रूप अनेक
कोई विग्रह नहीं जिसका
 
क्या से क्या लिख देते हैं
और लिखते हैं कि
जो भी सुंदर होगा निष्कवच होगा
तो मैं पूछता हूँ
ईश्वर इतने कवच क्यों धारण करते हैं?
चक्के का केंद्र नहीं घूमता
चक्का घूमता है
 
मन भी तो घूमता है
मन का केंद्र पाना
ख़ुद को पाना है क्या ?
 
सिमुर्ग हमारी सोच है
मन से निकली सोच
पर ख़याल की परिधि नहीं दिखती
क्या केंद्र दिखता है?
सड़क अगर चलती ही रहती हैं
तो मंज़िल केंद्र है क्या ?
जहाँ रुकते ही
वो छोटी वाली ज़िंदगी की
दीपशिखा बुझ जाती है
इस तरह के गूढ़ रोचक सवालों का क़ाफ़िला
कि गर्द में खो जाते है
जब लेखक
इतिहास से बीन कर
क़िस्सागोई सुनाता है
जो कि सच्ची घटना रही होगी
क्यूँकि सच्ची घटना के
मिथ बनने का सफ़र ही इतिहास है
वो लिखते हैं तो वो हर चीज़
उनकी प्राप्ति में बदल जाती है
और सफ्हों पर
सही का नीला निशान लगता चला जाता है
और इस तरह इस किताब को लिख कर
प्राप्ति का पूरा पन्ना भर लिया है उसने
मैंने मांडू नहीं देखा की समीक्षा जब लिखी थी तब
बाज बहादुर और रानी रूपमती की इतनी अच्छी
वृत्तांत कथा नहीं सुनी थी ।
पढ़कर मांडू जाना अब लगभग तय हो गया है
अगर फल और मिठाइयों के खोजी व्याख्या के साथ कुछ और रोचक प्रसंग भी होते तो
यह दास्तानगोई की एक अनुपम भेंट होती।
कुछ फ़लसफ़े छू कर छोड़ दिए गए भी लगे।
सुशोभित आपने जो किताबघर बचपन से बनाना शुरू कर दिया था वो मैंने चालीस के दशक को पार करने के बाद शुरू किया ।
मुझे आपसे बस एक सवाल पूछना है कि कितनी किताबें पढ़ी है आपने जो ऐसा फ़लसफ़ा बयान कर दिया ।
बहुत सारे नए शब्दों की बेहतरीन अभिव्यक्ति -मेरे लिए सीखने को बहुत कुछ था
 

The post ‘माउथ ऑर्गन’ अपनी धुन गुनगुना रहा है appeared first on जानकी पुल - A Bridge of World's Literature..


Viewing all articles
Browse latest Browse all 1483

Trending Articles