मुक्ति शाहदेव पेशे से अध्यापिका हैं। राँची में रहती हैं। उनका पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है ‘आँगन की गोरैया’। कुछ कविताएँ उसी संग्रह से- मॉडरेटर
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प्रेयसी वसंत की
मैं हूँ पलाश
प्रेयसी वसंत की
शोख़ चंचल उन्मुक्त।
उदासी का मेरे आँगन
है क्या काम?
पल-पल प्रतिपल प्रतीक्षारत मैं
प्रेम की धार में बह जाने को।
सर्वस्व हारकर प्रेम में
होती हूँ परिपूर्ण मैं
छूकर ही चला गया प्रेमी वसंत
पोर पोर मेरा है खिल रहा
छुअन की पुलकन से
डाल-डाल पसरा है यौवन मेरा
सुनो, हर पंखुड़ी कहती है
प्रेम हृदय में मेरे प्रतिपल पल रहा
हाँ, मैं हूँ प्रेयसी वसंत की।
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रोशनी सुबह की
कब तक रहेंगे हम
उदासी में डूबकर
चलो जी लें कुछ पल
पुराना सब भूलकर
अंधेरे यादों के आज
विदा न ले सके तो क्या
यकीनन धुंधले पड़ जाएँगे
सुबह की रोशनी के साथ।
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उड़ान
अब न रोको उसको
देहरी से निकले हैं पाँव उसके
जो दी है आज़ादी तो
यूँ न काटो पंख उसके
उड़ने दो एक बार जी भर के
उसके हिस्से का
छीनो न आकाश उससे।
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