वंदना राग के उपन्यास ‘बिसात पर जुगनू’ को मैंने पूरा पढ़ लिया है तो आपको कम से कम एक अंश पढ़वाने का फ़र्ज़ तो बनता ही है। अगर राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास का अंश पसंद आए तो कल इस उपन्यास पर आयोजित कार्यक्रम में भी ज़रूर पधारिएगा- प्रभात रंजन
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आषाढ़ की सुबह का सफ़र, 1840
यह एक मन्दिर है। मैं यहाँ लिखने बैठ गया हूँ।
मशालची ने कहा है कि वे सब यहीं रुककर पानी पिएँगे, सुस्ताएँगे और घोड़े को भी पानी पिलाएँगे। मैं अभी इस मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठ गया हूँ। यह मन्दिर पत्थर का है। पुराने क़िस्म का। इसका नक़्शा लगता है, भागते हुए लोगों ने बनाया है। जैसे वे सभी हमारी तरह रुके थे यहाँ सुस्ताने। उन्होंने मिट्टी के पिंड को स्थापित कर भक्तिभाव से माथा टेका, उस पर सिन्दूर का टीका लगाया और कहा, ‘हे देवी, हमारी रक्षा करना’ और फिर चले गए किसी दूसरे क़िले को फतह करने या जान बचाने। बाद में गाँववालों ने इसे देखा और देवी स्थान के ऊपर छत डाली गई। छत कच्ची है। एक फूस की झोंपड़ी के नक़्शे पर बनाया गया है यह मन्दिर…।
अभी-अभी एक पुजारी चलकर आया था मेरे पास। बैठा और गुड़ के साथ एक लोटा पानी पेश किया। मैंने गुड़ खाकर, पानी पिया और राहत महसूस की।
उससे मैंने जब कहा, “पानी मीठा है,” तो वह बोला, “हाँ बहुत। कुएँ का है। राजपूतों का बनवाया है। बाहर से आए थे और कहीं चले गए।”
“बाहर?” मैं नहीं समझा, तो उसने तफ़सील दी, “शायद दूर के किसी गढ़ से आए थे। कोई गढ़ जो विन्ध्याचल में था, कई साल पहले। अब उनकी पुश्तें आसपास के कई गाँवों में बसी हैं। कई तो सिपाही हो गए फ़िरंगियों की फ़ौज में भी।” मैं हैरत से भर गया। पुजारी की बातें सुन। यह कैसा पुजारी है? क्या कोई पुजारी होकर इतना कुछ जान सकता है? और जिन राजपूतों की शौर्य की कहानियाँ सुनकर मैं बड़ा हुआ था क्या वे भी फ़िरंगियों की फ़ौज में भर्ती हो रहे थे अब? क्यों?
“राजपूत हों, ब्राह्मण हों या नान-जात, सब फ़िरंगियों की फ़ौज में भर्ती हो रहे हैं।” वह रौ में कहता जा रहा था। “कहते हैं फ़िरंगियों की फ़ौज में रुपिया-कौड़ी अच्छा मिलता है। भूखे पेट मरने से तो अच्छा ही है कि आदमी शास्त्रों का नियम छोड़ दे। कुछ भी करे। यह कोई शिकायत की बात नहीं। अपना-अपना नज़रिया है।” यह बोलते वक़्त वह एतमाद से भरा नज़र आया था।
मैंने उससे सवाल किया था, “फ़िरंगी तो सबको तबाह कर रहे हैं, पटना में हर जगह उनके बारे में यही सुनने को मिलता है। उनके साथ कोई देशी कैसे हो सकता है?”
“हाँ,” वह गहरी साँस ले बोला था, “सब नहीं जाते बाबू, कुछ झूठी शान से भर नहीं जाते और कुछ अपने धर्म, अपने घर, अपनी इज़्ज़त पर मान करते हैं और भुखमरी और तबाही के रास्ते चलते हैं। वे भी नहीं जाते फ़िरंगी के पास! लेकिन तुम देखना जो गए हैं वे सब भी लौटकर आएँगे एक दिन। वे सब भी तबाही का रास्ता अपनाएँगे।”
उसका एतमाद अब उसकी नसों से टपककर चारों ओर नूरानी हल्हा की शक्ल अख़्तियार कर रहा था। मैं उसकी हर बात और हर बात के तर्क को समझ मुत्तफ़िक़ हो रहा था।
आख़िर रोज़ी-रोटी का सवाल कितना ज़रूरी है, यह मुझसे बेहतर कौन जान पाएगा? और यह भी सही है कुछ लोगों के लिए रोज़ी-रोटी से बढ़कर उनकी आन-बान होती है। मैं उसे देखता हुआ ज़िन्दगी के मायने को मन के पलड़ों पर तौल रहा था।
यह पुजारी कितना जानकार है। एक फ़लसफ़ी जैसा। पढ़ा-लिखा और आम समझ-बूझ से भी भरा हुआ। यह महज़ पुजारी न रहा अब तो ज्ञानी पंडित हो गया है। अपने हालातों को समझता-बूझता ज्ञानी। मैं समझ रहा था इसके ज्ञान के इज़ाफ़े में राहगीरों का बड़ा हाथ रहा होगा। वे जो अक्सर उसके मन्दिर पर रुक सुस्ताते होंगे और अपनी बातें उससे बाँटते होंगे।
“आप चाँदपुर जा रहे हैं बाबू? मन में राजी-खुसी लेकर जाइएगा। बहुत अच्छे हैं बड़े राजा। अपने मातहतों का बहुत ख़याल रखते हैं। हमें इस मन्दिर के रख-रखाव के लिए बहुत दान देते हैं।” मैं सुन रहा था और मुझे बहुत अच्छा लग रहा था यह सब सुनकर।
जब मैंने उससे पूछा, “क्या यह गाँव बड़े राजा का ही है?” तो वह बोला था, “नहीं, इस गाँव के लोग नवाब राघवपुर को लगान देते हैं। नवाब साहब के लगान का हिस्सा अब फ़िरंगी लेता है। हालत ख़राब है नवाब साहब की। फ़िरंगी नवाब साहब को अब धान नहीं उगाने देता है, धान के बदले…इसके बाद वह चुप हो गया था। खो गया हो मानो कहीं।
मैंने उसे थोड़ी देर खोने दिया फिर जब पूछा था, “धान के बदले क्या बोया जाता है अब यहाँ?” तो उसने कोई जवाब नहीं दिया था और चुपचाप मन्दिर के पीछे ले गया था, जहाँ से मुलायम सफ़ेद मिट्टी में हरे मझोले पौधे खड़े दिखलाई पड़ते थे। उन पौधों से कुछ ही रोज़ पहले बीत गए बसन्त के दिनों में खिलकर फट गए सफ़ेद और गुलाबी फूल आज ज़मींदोज़ हो अपने इन्कलाबी तेवरों की कहानी बयान कर रहे थे। उन पौधों की टहनियों से लगे गोल फल अब तोड़े जाने के इन्तज़ार में थे। पुजारी यह सब मुझे दिखाता हुआ दोबारा कहीं खो गया था।
थोड़ी देर बाद वह मन्दिर के पीछे के हिस्से में बैठ गया था और बोला था, “नवाब साहब फटेहाल हो रहे हैं। बाबू कुँवर सिंह के साथ उठना-बैठना कर रहे हैं। मशालची बता रहा था आप बड़े राजा के जहाज़ पर नौकरी करने जा रहे हैं। मुझे मालूम है उनका जहाज़ कहाँ जाता है। उसी देश के लिए ये फ़सल तैयार हो रही है। हमारे प्यारे नवाब साहब की तबाही की फ़सल, सबके लिए तबाही की फ़सल साबित होगी एक दिन देख लेना।”
यह बात वह नजूमियों की तरह बोला था।
“बरसों से इस मन्दिर के सरपरस्त नवाब साहब के पुरखे रहे हैं। लेकिन अब…क्या करें नवाब साहब हमारे ? क्या करें बेचारे…? फिर उसकी आवाज़ में छल से उगा मातम पसर गया था।
ग़मगीन हो लेकिन उस वक़्त वह चुप नहीं हुआ था, हमें आगाह करता रहा था। धूप उतर रही है। अब आप लोगों को निकलना चाहिए। शाम से पहले पहुँचना ज़रूरी है। आजकल रास्ते में पुराने क़िस्म के चोर-डाकुओं के अलावा फ़िरंगी भी कब किस कोने से निकलकर हमला कर दे, मालूम नहीं। फ़िरंगी की जात न समझ में आनेवाली जात है। जो उनकी बात नहीं मानता उनको पेड़ों पर लटका देते हैं।”
ऐसा लगा वह किसी पेड़ पर लटकी लाश को याद कर सिहर उठा है, बार-बार ऐसे ही सिहरने लगा था।
फिर सँभलकर बोला था, “बारिश आने का ख़तरा भी है। जाइए!”
मैं उसे देर तक देखता रहा था। यह कैसा रहस्यमयी शख़्स था!
मैं उसके पास और बैठकर इस जगह के बारे में जानना चाहता था लेकिन वह हो न सका। उसकी बातें कितनी दिलचस्प थीं। लेकिन अब वह और बात करना नहीं चाहता था। उसने हमें विदा कर दिया था और फिर वह मन्दिर के पिछले हिस्से में चटाई बिछाकर सो गया था या सोने का नाटक कर रहा था।
मशालची ने आवाज़ लगाई थी, “आ जाईं मालिक।”
हमारा सफ़र सामने था। मैं टमटम में बैठा और अपने सवालों से बेचैन हो मशालची से पूछ बैठा था, “यह कैसा पुजारी है?”
“ख़बरदार…ख़बरदार।” मशालची टमटम के आगे दौड़ने लगा था, और साँसों की हँफनी के बीच बोला था।
“सिर्फ़ पुजारी नहीं है हुज़ूर…मुख़बिर भी है…।”
“मुख़बिर?”
मेरी हैरत अब सरपट दौड़ने लगी थी, मशालची के साथ।
“समझ जाइएगा हुज़ूर…हम चाकर लोग अब का कहें…?” वह होंठ भींचकर बोला था।
इसके बाद दुशाला ओढ़कर टमटम में ऊँघते रहने के सिवाय क्या उपाय था मेरे पास?
वही किया मैंने!
फ़. अ. ख़ान
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