आज योगिता यादव की कहानी। समकालीन कथाकारों में सुपरिचित नाम योगिता यादव का नया कथा संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से आया है ‘ग़लत पते की चिट्ठियाँ’। उसी संग्रह से यह कहानी- मॉडरेटर
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स्मृति की अधूरी ‘रेखा’
क्लास में बाकी सभी बच्चे शर्मा, वर्मा, मल्होत्रा, उत्पल, मुखर्जी, महामना वगैरह थे, लेकिन ‘रानी’ वह अकेली थी । ‘रेखा रानी’। बहुत ज्यादा सांवली । फिर भी उसके चेहरे पर एक मासूमियत थी । प्राइमरी से हायर सेकेंडरी स्कूल में पहुंचने पर जब फ्रॉक की जगह स्कर्ट ब्लाउज ने ली तब सबसे ज्यादा भद्दी वही लगती थी । सिर्फ चेहरा ही नहीं उसके हाथ, पांव पूरा शरीर पक्के रंग का था । एक तो उसकी देह में मांस न के बराबर था, दूसरा उसने स्कर्ट इतनी लंबी खरीद ली थी कि वह उसके घुटनों तक तकरीबन छह इंच तक नीचे आती थी। ये छह इंच शायद अगले छह साल तक स्कर्ट के चलते रहने की गारंटी थे । ऐसे में वह स्कर्ट कम और पेटिकोट ज्यादा लगती थी। छह इंच का यह अंतर लंबाई में ही नहीं कमर के मुकाबले स्कर्ट की चौड़ाई में भी था। स्कर्ट उसकी कमर के साइज से ज्यादा ज्यादा खुली थी। जिसे वह दोनों तरफ पिन लगाकर अपनी कमर के साइज का करने की कोशिश किया करती। उसके बाद भी उसे बेल्ट से कसकर ऐसे बांधती कि वह कमर से बिल्कुल हिले-डुले न । स्कर्ट का दम जब बेल्ट में बहुत ज्यादा घुटने लगता तो वह जहां-जहां से जगह पाती निकल आती । फिर वह किसी कोने से छल्लों में टंगा परदा तो किसी दूसरे कोने से झोला सी लगती। जुराबे उसके पैरों से बमुश्किल चिपकी रहतीं। उसे दूर जाते देखते तो लगता जैसे ये पूरी यूनिफॉर्म किसी देह पर नहीं बल्कि बांस के दो डंडों पर बस बेवजह टांग दी गई है। कभी-कभी वह खेतों में खड़ा बांस और हांडी का पुतला लगती। इस सबके बावजूद वह बहुत साफ-सुथरी रहा करती थी । हर रोज बालों में तेल डालकर दो चोटियां बनाती । उसकी दोनों चोटियां रिबन के दो सुंदर फूलों से सजी रहतीं । उसके बाल भी उसी की तरह पतले, काले थे । पर लंबी होने के कारण उसकी चोटियां खूब सुंदर लगतीं। उसके कपड़ों पर एक दाग भी कभी किसी ने नहीं देखा होगा। जबकि बाकी बच्चों की स्कर्ट की पॉकेट दोपहर तक ग्रे रंग की हो जाती । स्कर्ट ही नहीं उसकी सफेद शर्ट भी चौंकाने वाली सफेदी में रहती । वह जैसी व्यवस्थित सुबह घर से आती थीं दोपहर को स्कूल से घर जाते हुए भी वैसी ही व्यवस्थित हुआ करती थी । कुल मिलाकर ईश्वर ने रूप रंग देने में भले ही उसके साथ नाइंसाफी की हो, लेकिन अपने ढंग में वे जरा भी कोताही नहीं बरतती थी। उसकी ही तरह उसकी सब चीजें करीने से सजी होती। किताबों और कॉपियों को वो अखबारों से कवर करके उन पर सुंदर लिखाई में अपना नाम, क्लास, रोल नंबर लिखती । उसका बस्ता भी उसी की तरह बहुत व्यवस्थित रहता।
रेखा रानी पूरे स्कूल में अपनी तरह की अकेली लड़की थी । उसे लंच टाइम में कभी किसी ने खाना खाते नहीं देखा । वास्तव में वह टिफिन लाती ही नहीं थी । स्कूल में मौजूद रहने वाले कई लोगों में से कुछ तो यह भी कहते थे कि ये भुखमरी की औलाद है। वह इतनी बदसूरत है नहीं, जितनी दिखती है। कुछ का मानना था कि उसके नैन नक्श तीखे हैं। खाद-खुराक मिले तो उसके गालों पर भी मांस आ जाएगा। और तब वह एक सुंदर लड़की दिखने लगेगी। खैर उस वक्त तक हमें सौंदर्य का कोई खास बोध नहीं था । हमारे लिए सुंदर होने का मतलब सिर्फ गोटा-किनारी में सजी दुल्हन होना ही था । पर हमें उसकी लिखाई बहुत सुंदर लगती थी, जो थी भी । स्कूल में अक्सर चार्ट उससे बनवाए जाते । चार्ट पेपर, पेंसिल, स्कैच पैन सब कुछ उसे स्कूल से दिया जाता। उन पर वह अपनी सुंदर लिखाई के मोती जैसे अक्षर उबार देती।
और भी कई रिकॉर्ड सिर्फ रेखा के नाम थे । पिछली न जाने कितनी ही क्लासों से वह फर्स्ट आ रही थी । मुझे लगता है कि वह स्कूल में आई भी फर्स्ट आने के लिए ही थी । गेम्स कॉम्पीटिशन में जाती तो बिना अवॉर्ड लिए नहीं लौटती । उसके जीते सब अवॉर्ड प्रिंसीपल रूम में सजा दिए जाते । वह केवल उन्हें जीतकर ही खुश थी । पता नहीं खुश थी भी कि नहीं । क्योंकि मैने उसके चेहरे पर कभी कोई दूसरा भाव नहीं देखा । उसके चेहरे का एक ही भाव स्थायी हो चुका है। बहुत याद करने पर भी मुझे उसका खिलखिलाता चेहरा याद नहीं आता।
स्कूल के कल्चरल कॉम्पीटिशन में जब सारी लड़कियां सज-धज कर दुल्हन सी दिखतीं, उनमें भी वह अजीब सी दिखती। उसके सांवले चेहरे पर कोई भी मेकअप सजता नहीं था। सिवाए काजल के। लहंगा-चुनरी तो उस पर और भी अजीब लगते । खैर उसे जैसे-तेसे सजाया जाता । लेकिन जब मंच पर उतरती तो सबको हैरान कर देती । उसके हाथ-पैर, कमर ऐसे लचकते कि देखने वाले तालियां बजाए बिना न रहते । और फिर वही होता जो हर बार होता था । वह झोली भर पुरस्कार अपने साथ ले जाती । तब म्यूजिक मैम उसे गले से लगा लेती और वह चुहिया की तरह उनसे चिपकी हुई लगती। असेंबली में प्रिंसीपल मैम सबके सामने उसकी पीठ थपथपाती।
सब बच्चे उसके लिए खुलकर तालियां बजाते। आठवीं क्लास तक आते-आते असेंबली में भाषण गतिविधि का आयोजन होने लगा। हर रोज एक न एक बच्चे को असेंबली में सम सामयिक मुद्दों पर दो मिनट का भाषण देना होता । वहां भी हम देखते कि जैसे उसने सब मुद्दे घोट कर पी लिए हैं । लंबी स्कर्ट पहने वह मंच पर ऐसे चढ़ती कि अभी चढ़ते-चढ़ते गिर पड़ेगी । अब लगने लगा था कि उसका शरीर ही नहीं कद भी बेहद कंजूसी से बढ़ रहा है । पर मंच पर पहुंचते ही वह प्रिंसीपल मैम, अन्य टीचर्स और असेंबली में मौजूद बच्चों को ऐसे संबोधित करती जैसे लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री संबोधित कर रहे हों । न जाने कैसे उसे हर विषय की जबरदस्त समझ होती । प्रधानमंत्री और अन्य प्रमुख लोगों के लंबे-लंबे और मुश्किल नामों का ऐसे उच्चारण करती जैसे वह उसके साथ ही खेल कर बड़े हुए हैं। उसके सामान्य ज्ञान के हम सब कायल हो जाते । सबसे ज्यादा मंच पर चढऩे का मौका उसी को मिला । इतना ही नहीं कई बार बच्चे तैयारी न होने पर अपने हिस्से की बारी भी उसे ही दे दिया करते । तब वह केवल दो मिनट अखबार पर नजर दौड़ाती और फर्राटेदार स्पीच देकर आती।
उसके माता-पिता को कभी किसी ने स्कूल आते नहीं देखा । आठवीं में जब सभी बच्चे एग्जामिनेशन फॉर्म भर रहे थे तब वह टीचर के पास आकर सुबकने लगी । उसने क्लास टीचर से कहा कि वह परीक्षा नहीं दे पाएगी । न ही अब वह आगे पढऩा चाहती है । उसकी इस बात पर जितना वह सुबक रही थी उससे ज्यादा स्कूल की टीचर्स दुखी थीं । फिर उसने कारण बताया कि उसके पिता ने एग्जामिनेशन फीस देने से मना कर दिया है। वह रिक्शा चलाते हैं। इस कमाई से तीन बच्चों को पालना मुश्किल हो रहा है। उस पर फीस कहां से दें। मां भी अब बीमार रहती है। इसलिए अब उसे ही स्कूल छोड़कर उनकी जगह लोगों के घरों में काम करने जाना होगा । और छोटे भाई-बहनों को भी संभालना होगा।
क्लास टीचर ने उसे प्यार से डांटते हुए आंसू पोंछने को कहा और उसकी घर की माली हालत के प्रति सहानुभूति प्रकट की। साथ ही उसकी फीस अपने पर्स से भरते हुए उसे परीक्षा देने के लिए राजी किया। वह खुश हो गई, लेकिन आगे वह पढ़ पाएगी या नहीं, इसका फैसला उसके हाथ में नहीं था। स्टाफ रूम में इस बात पर लगातार कई दिनों तक गहन चर्चा होती रही। प्रिंसीपल ऑफिस तक यह बात पहुंची। उन्होंने भी रेखा को बुलाकर समझाया। उसके लिए तो इतनी ही खुशी बहुत थी कि अब वह परीक्षा दे पा रही है। प्रिंसीपल ने उसे अपने पिता को स्कूल में बुलाने के लिए कहा। लेकिन लगातार कई दिनों के बाद भी उसके पिता स्कूल नहीं आ पाए। रेखा रानी ने आकर क्लास टीचर को बताया कि उसके पापा को इस वक्त रिक्शे पर सामान छोडऩे जाना होता है, अगर वह स्कूल आएंगे तो उनकी ध्याड़ी मारी जाएगी। आखिर तीन टीचरों का एक समूह बनाया गया। इस समूह को स्वयं रेखा के घर जाकर हालात समझने को कहा गया। इस समूह की कोशिश पर ही रेखा का भविष्य अटका हुआ था। उसमें दो अध्यापिकाएं और एक लैब असिस्टेंट शामिल था । लेकिन जितनी तैयारी से इस समूह को भेजा गया था उतनी ही मायूसी से वे लोग लौट आए । रेखा रानी के घर की हालत ऐसी थी कि जिंदा रहे यही बड़ी बात होगी । उस पर मां की बीमारी में भी रुपया खर्च हो रहा था । आगे की पढ़ाई बहुत ज्यादा नहीं तो, थोड़ा तो खर्च मांगती ही थी । जो इस परिवार के वश के बाहर था। उससे भी ज्यादा मुश्किल था मां के बीमार पडऩे से घर में आ रही एक आमदनी का बंद हो जाना । जिसका जरिया अब मां की जगह रेखा रानी को बनना था ।
हमारी क्लास टीचर इस बात से सबसे ज्यादा दुखी थीं । आखिर उन्होंने रेखा के पिता के सामने रेखा को गोद लेने का प्रस्ताव रखा। यह बात उन्होंने प्रिंसीपल से भी कही। वह चाहती थी कि धन के अभाव में एक काबिल लड़की का भविष्य खत्म नहीं होना चाहिए । लेकिन इसके लिए सबसे पहले रेखा का तैयार होना जरूरी था । रेखा सभी टीचर्स की फेवरिट स्टूडेंट थी । तन और मन के काफी बदलाव अब हमें समझाए जा रहे थे और हमें खुद भी समझ आ रहे थे । बढ़ती उम्र में खुराक की जरूरत को समझते हुए अब क्लास टीचर अपने घर से उसके लिए टिफिन बना कर लाती । दोनों रिसस में एक साथ लंच करते । इसके बदले में रेखा रानी मैम का टिफिन साफ करती और उसे धो पोंछकर वापस बैग में डालती । खाना खाने से पहले वह खुद मैम के लिए पानी का गिलास भर लाती और बाद में उसे साफ करके मैम के लॉकर में रखती । मैम को शायद लग रहा था कि अब यह और भूखी रही तो इसके शरीर में कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। हमारी क्लास टीचर के रेखा रानी को गोद लेने के इस फैसले से सभी खुश थे और उन्हें एक शुभ काम के लिए शुभकामनाएं भी दे रहे थे । साथ की अन्य टीचर्स कहती, ”इस बेचारी की खुराक ही कितनी होगी मेहता मैडम, इतना तो हमारे बच्चे डस्टबिन में फेंक देते हैं।” रेखा रानी शर्मा कर सिर झुका लेती और चिडिय़ा की तरह धीरे-धीरे कोर निगलती रहती । सभी का मानना था कि अगर मेहता मैडम इसे गोद ले लेंगी तो यह दोनों वक्त भरपेट खाना खा पाएगी और मेहता मैडम की भी घर में हेल्प हो जाएगी। कम से कम इस प्रतिभावान लड़की का भविष्य तो संवर जाएगा । रेखा भी क्लास टीचर के इस प्रस्ताव से खुश थी । अब जरूरत उसके पिता से बात करने की थी । आखिर जोर देकर एक दिन उसके पिता को पूरे सम्मान के साथ स्कूल बुलवाया गया । और फिर प्रिंसीपल मैम ने क्लास टीचर मेहता मैडम का यह प्रस्ताव उसके पिता के सामने रखा । टीचर इसके लिए पूरी कानूनी कार्रवाई करने को भी तैयार थी । इस प्रस्ताव पर उसके पिता ने जो कहा उसने सभी को तिरस्कार मिश्रित अवसाद से मायूस कर दिया ।
रेखा रानी के पिता बोले, ”मैडम जी हम लोग गरीब आदमी, हम लोग अपने बच्चा को ज्यादा नहीं पढ़ा सकते। पर किसी को देंगे नहीं। नइ मैडम जी नइ। बच्चा सब से तो घर में चहल पहल है। किसी को काहे को देना। जो कमाते हैं सब मिलकर खाते हैं।”
उस दिन प्रिंसीपल ऑफिस से हमारी मेहता मैडम आंसू पोंछते हुए बाहर निकली । टीचर का वह आंसू पोंछता चेहरा बच्चों के लिए हृदय विदारक होता है । मेरे किशोर मन पर पड़े वह आंसू आज भी वही ठहरे हैं। मैं आज भी यह तय नहीं कर पाई हूं कि रेखा रानी के पिता ने सही किया या गलत? अपने बच्चों को हंसते-खेलते, लड़ते-झगड़ते, शैतानियां करते देखती हूं तो दिन भर का सारा तनाव उड़ जाता है। फिर लगता है कितना सही कहा था रेखा रानी के पिता ने । लेकिन जब अपनी अल्मारी में रखे पुरस्कारों को देखती हूं तो लगता है कि उसके लिए कैसा रहा होगा किशोरावस्था में ही अपनी उड़ान का रुक जाना । जबकि मैं जानती हूं कि तुम हम सबसे ऊंचा उड़ सकती थीं रेखा रानी । आठवीं पास करने के बाद हम सभी बच्चे अलग-अलग स्कूलों में चले गए। पर यह नहीं पता कि रेखा रानी तुम किसी स्कूल में गई या नहीं।
मुझे माफ करना रेखा । मैंने तुम्हारा वास्तविक नाम इस्तेमाल किया , कि अगर कहीं तुम हो तो इस सवाल का जवाब दे पाओगी कि तुम्हारे पिता ने जो किया वह सही था या गलत? हो सकता है तुम उस अभाव में भी पढ़-लिख कर एक कामयाब लड़की बन गई होवो । या फिर हो सकता है कि दो-तीन दुबले पतले बच्चों को संभालती तुम किसी घर की सुगढ़ गृहणी हो । तुम मुझे भले ही न मिलो । पर किसी घर में बर्तन मांजते हुए या किसी ऑफिस में लोगों को पानी पिलाते हुए कतई न मिलना । क्योंकि तुम्हें पता है कि तुम बहुत काबिल थीं। उस स्कूल में पढ़ा एक-एक बच्चा जानता है कि अपनी तरह की तुम अकेली थी।
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