वीरू सोनकर युवा कवियों में एक ऐसे कवि हैं जिनका अपना विशाल पाठक वर्ग है। सोशल मीडिया के सबसे सक्रिय कवियों में एक अच्छे कवि वीरू का कविता संग्रह आया है ‘मेरी राशि का अधिपति एक सांड है’। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब के बहाने वीरू सोनकर की एक नई कविता पढ़िए- मॉडरेटर
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भारत भवन की पत्रिका ‘पूर्वग्रह’ के कविता-विशेषांक में लंबी कविता ‘आग की भाषा’ आई है. इस कविता का पहला पाठ पटना में रज़ा फाउंडेशन के कार्यक्रम ‘दो दिन कविता’ में किया जा चुका है. जिन मित्रों के पास पत्रिका नहीं है वह इस कविता को पढ़ना चाहें तो यहाँ भी पढ़ सकते हैं.
【आग की भाषा】
दस लपटें
(१)
तुमसे सौभाग्यशाली कौन होगा अगर चुन लेती है तुम्हे आग
आग को कोई सलीका नहीं
राख उसका श्रृंगार है
बिफरना उसका आदिम गीत.
वह देह से नग्न है
एक उसी की परछाई बिखेरती है ढेरो-ढेर रोशनी
लपटों की काया हर नियम तोड़ते चलती है.
(२)
आग को विनम्रता से भरे मनुष्य नहीं भाते
वह बे-लिहाजो के प्रेम में हर चीज का आकार बदल देती है.
अगर उसे देखने का सलीका है
तो उसे उस जगह पर देखो, जिस जगह के बारे में दावे किए गए कि वह वहाँ नहीं है.
जैसे जबड़ों पर कठोरता की शब्दावली में बुदबुदाना ज्यादा खतरनाक होता है अपेक्षाकृत चीखने के
ठीक वैसे ही भड़क चुकी आग से ज्यादा खतरनाक होती है सुलग रही आग
आग की ओर से कोई बयान नहीं दिया जाता है
उसे छुओ
उसे देखो
उसे उसके रंग से मत पहचानो
उसके भीतर से बह कर बाहर आती ऊष्मा का संगीत अपनी देह में भरो.
अपनी पुतलियों में उसकी छाप भरते हुए
अपने शहर को याद करो.
अपना नाम
अपनी नदी
अपने दोस्त को याद करो
आग के दो हाथ हैं
पृथ्वी पर दान के लिए हमेशा उदारमना और व्याकुल
उसके एक हाथ मे है मृत्यु
तो दूसरे में पुनर्जन्म!
स्मृति आग के चेहरे पर भीगते हुए नाचती है.
(३)
मैं अल्पज्ञों में पहला हूँ
विराटता में एकदम न्यून
मैं जिस ग्रामर में चीखता हूँ बोल रही एक भाषा मे उसे मौन कहते हैं
मैं समय के भीतर तो हूँ पर तिथियों की परिधि से बाहर हैं मेरा इतिहास
मुझे एकाग्रता का शोर मानो
मौन की व्यापकता में जहाँ दृश्य बदल जाते हैं संगीत के अलजेब्रा में
समुद्र की पहली उठी लहर है मेरी पूर्वज
मेरी संतानों से बनेगा
टिके रहने का सफल सिद्धांत
मैं विशेषज्ञों में अंतिम हूँ
विश्लेषकों का अंतिम शिकार
मेरी हत्या मेरे समय की सबसे जरूरी बात होगी.
मेरा लिहाज इस मायने में किया जाए कि मैंने आग और आकाश को एक ही तरह से देखते हुए कई सदियां बिताई हैं
(४)
सबसे उदास दिनों में हमेशा याद रखना चाहिए
कि आग और बारिश से नजर नहीं मिलाना
यह पृथ्वी के सबसे गहरे कुँए हैं
स्मृतियाँ अच्छे भले आदमी का हाथ पकड़ उतर जाती हैं इनमें
स्मृतियाँ नीरस विषय याद नहीं रखती
पीले पड़ते हुए
हममें एक समुद्र कितना अधिक मौजूद था
अंततः हमे शोर याद रहा या चिड़िया की चहक
क्या हमने राख को ठीक से देखना सीखा ?
हमने कब एक चित्र के भूरेपन को चूम कर उसे प्यार किया
हमने कितना याद रखा
कि हवा और स्वेद से रगड़ खाई देह एक दिन जरूर नष्ट होगी
दूर तक फैला होगा उसकी स्मृतियों का नमक
मौसमों से भीगी एक देह पथराई भूमि पर कितनी दूर तक चली थी
रंगों की परछाइयाँ कैसे उतराती थी उसकी आँखों में
उसने जाने से पहले पत्थरो को सहलाया था
या तोड़ा था उनके भीषणतम रूप को
स्मृतियाँ साज-सज्जा नहीं बचाती हैं
उनके स्वप्न बचाये रखती हैं
स्मृतियाँ डायरियाँ नहीं बचाती हैं
वह उन डायरियों की आत्मा बन कर किसी तकिए के नीचे सो जाती हैं
स्मृतियाँ पानी भी नहीं बचाती हैं
वह उसके बरसने को दुहराती हैं
स्मृतियाँ हवा भी नहीं बचाती
वह उसके बहते रहने का पुरातन संगीत याद दिलाती हैं
वह अपने भीगे पँखो पर बिछा देती हैं
धुलते हुए रंगों की बाढ़ में हमारा अनोखा मटमैलापन
उन्हें हमारे आसपास की चीजों के छिलके उतारना आता है
वह कभी नहीं भूलतीं
कि एक वक्त हमने चखा था
सबसे पहले प्यार की खुशबू का स्वाद
वह एक धीमी बहती नदी पर धुंआ बन कर उतर जाती हैं और हमारे आस-पास की हर चीज को ढक देती हैं
(५)
मैं हर तस्वीर में थोड़ा तिरछा आता हूँ
दृश्य के रहस्य को थोड़ा खोलता
थोड़ा छुपाए रखते हुए
मैं घर के दरवाजे को खोलता हूँ
पर उसकी खड़खड़ाहट का मुँह बंद रखते हुए
पलायन के सबसे पहले सिद्धन्त का अनुसरण करता हूँ
कि जहाँ हो वहाँ से कहीं और पहुँचना
पलायन नहीं है
दरवाजे से इस तरह जाने वालों को यात्री कहते हैं
पलायन का सीधा मतलब है
जहाँ हो, वहाँ से निकल भागो!
(६)
उसकी एक धुंधली परछाई मेरे पास बनी रहती है
एक अमिट गंध
हमेशा उकसाती हुई
मैं किस्तों में पानी पीता हूँ
आग की धीमी मृत्यु की कल्पना में
मुझे मृत्यु का घर नहीं पता
मैं आवेगों के समुद्र में सोता हूँ
(७)
मेरे प्रयत्नों में इतनी दिशाएं हैं
कि यह ब्रह्मांड भाग नहीं पाता
आग अपना स्वभाव नहीं भूल पाती
यात्राएँ हैं कि जन्मती ही रहती हैं
पानी के अचरज खत्म ही नहीं होते कि इस संसार में ऐसी कोई भी जगह नहीं
जहाँ रोशनी के निशान न मिलते हों
दुख आग की धीमी जलती लौं है जिंदगी को गर्माहट देते हुए
अपना एक अलग ही शहर बसाए हुए
यह पराजितों के लिए नागरिकता निर्मित करता है
मुझे अपना शहर याद नहीं रहता!
मुझे रोशनियां याद रहती हैं
रोशनियों के मायने ही बदल गए
अंधेरों
तुम्हारे होने का शुक्रिया!
(८)
मैं संसार का सबसे बड़ा दुख हूँ
मुझे कलाओं के गहरे कुँए में उतार कर पाप मुक्त करो.
मेरा हाथ पकड़ो, मुझे वीणा के पास ले चलो
तरंगित तारों के बीच मुझे मौन की तरह भरो.
मैं हवाओ में भरता हूँ मोक्ष
पानी के भीतर लय
एक भाषा के भीतर व्याकरण की तरह उतर जाना मेरा सबसे आदिम अभ्यास है.
मैं मृत्यु के हाथों से छीनता हूँ समस्त उत्तरमालाएँ
मैंने नदियों को वर दिया है
कि धूप और परछाई उस पर नहीं बिछा पाएंगी अपना संतुलन-जाल.
अगर गिराना हो मुझे
तो चिड़िया की चोंच से निकले पहले स्वर की तरह
सुबह की गोद मे गिरा देना.
अगर थामना तो किसी अनाम गंध की तरह मुझे याद रखना.
(९)
आग को ताले में रखना बेकार है
अपने आंदोलन में वह हर बांध तोड़ती है और पैदा करती है एक उपजाऊ और कामयाब विस्फोट
अपनी प्रकृति में वह कैद न किये जाने के लिए अभिशप्त है.
उदासी का आदिम चेहरा ओढ़े पृथ्वी को दहला देती है पर्वत के कान में आजादी की पहली सुगबुगाहट भरती आग
सभ्यता की तमाम उदास आँखे यूँ ही देखती लावा उगलते पर्वतों को
ज्वालामुखी से नीचे उतरते तमाम लाल अजगर रेंगते हुए नहीं
दौड़ते हुए नारा लगाते हैं
तोड़ो नींद को
दौड़ो बांध की ओर
हर निर्माण के पीछे आग के होने का खुलासा अब कर दो.
सिर्फ उन्हें ही पता है
कि आग के सबसे संक्षिप्त संस्करण के पास भी होती है ध्वनि.
कई परतों में दबे होने के बाद भी
आग बदस्तूर देती है अपने होने की गंध
वह उन्हें सावधान करते हैं जिन्हें आग की चुप्पी में शोर नहीं मिलता.
नदी में नाव की जितनी चुप्पी है न
ठीक उतना ही मौन ओढ़ कर सोती है बारूद में आग
जब भीतर आग नहीं होती
तो सारे समझदार घर्षण की शरण मे जाते हैं
(१०)
एक घट रही निरंतरता में हमारे न होने की गूंज से थर्राया
एक विराट महामौन होगा
आग की गुथी चोटियाँ तब भी कोई खोल देगा
अपने बिखरे बालो के साथ दौड़ लगाती आग
फिर से पैदा करेगी कोई सभ्यता
किसी धरती पर फिर से सेंध मारेगा पानी
फिर से होगा इस ब्रह्मांड में कहीं प्यार
फिर से किसी की आंखों में उतरेगी उदासी
फिर से रची जाएगी कहीं कोई भाषा
फिर से किसी मुहावरे की तरह उस भाषा मे आएगी आग
फिर से कोई देह टटोली जाएगी
फिर से मृत्यु की पहचान सिर्फ इस बात से होगी कि उसके भीतर आग है या नहीं.
पानी के भीतर मछलियाँ होगी
हवा के भीतर चिंगारियाँ
रक्त में ऊष्मा
और
बर्फ के भीतर गलन होगी
फिर से रहस्य चुपचाप बैठा होगा
गुफाओं के भीतर
पिरामिडों की अबूझ भाषा फिर से हराएगी भाषाविदों को
आग के घूँट भरेंगे योद्धा और प्रेमी
फिर से हारेंगे सब
और
जीतेगी आग
स्त्रियों की साड़ी के पल्लू में बंधी गाँठ के भीतर चुपचाप एक संगीत बुनती रहेगी आग!
【वी रु】
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