तारानंद वियोगी ने राजकमल चौधरी की बहुत अच्छी जीवनी लिखी थी, आजकल नागार्जुन की जीवनी लिख रहे हैं। अभी दो दिन पहले नागार्जुन की पुण्यतिथि के अवसर पर ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ पटना में उन्होंने नागार्जुन पर बहुत अच्छा लेख लिखा था। जिन्होंने न पढ़ा हो उनके लिए- मॉडरेटर
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बिहार की धरती ने साहित्यकार तो एक-से-एक पैदा किये लेकिन जिस कवि को याद करते ही साधारण आदमी की अजेय जीवटता का चित्र आंखों के आगे आकर खड़ा हो जाता है, वह बाबा नागार्जुन थे। आधुनिक भारतीय साहित्य में ऐसा अथक यायावर, ऐसा दो टूक बोलनेवाला, व्यंग्य की ऐसी पैनी धार वाला कवि कोई दूसरा न हुआ। मिथिला के निविष्ट ब्राह्मणकुल में जन्मे, नैयायिकों की बुद्धि और विद्यापति की भाषा विरासत में मिली, संस्कृत विद्या का कायदे से अध्ययन किया। लेकिन मन नहीं माना तो नौजवानी में ही स्वयं अपने पैरों चलकर, श्रीलंका पहुंचकर बौद्धधर्म में दीक्षित हुए। उधर से लौटे तो स्वतंत्रता-संग्राम में कूद पड़े। संग्राम की एक धारा तो वह थी कि सब मिलकर अंग्रेजों को हटाएं लेकिन दूसरी, और कहीं अधिक जरूरी धारा थी आम आदमी और किसानों की मुक्ति की, जिसका नेतृत्व स्वामी सहजानंद-जैसे तपे-तपाये नेता कर रहे थे। स्वामी जी को नागार्जुन अपना राजनीतिक गुरु बताते थे, जिनके आह्वान पर उन्होंने भूमिगत रहकर वर्षों जमींदारी-उन्मूलन की लड़ाई लड़ी। घातक चोटें खाईं, जेल गये, छूटे, फिर आन्दोलन में भिड़े। वह सुभाषचन्द्र बोस के साथ रहे और तेलंगाना के जनवादी विद्रोहियों के साथ भी, जिन्होंने एक अदने भारतीय इंसान की ताक़त का पहली बार अहसास कराया था। भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद तो तबतक जा चुके थे लेकिन उनकी जुझारू टीम मौजूद थी। चंपारण के किसानों के हक़ में लड़ते भिक्षु नागार्जुन को हम इसी टीम के साथ भूमिगत रहकर क्रान्ति का काम करते देखते हैं। इसी आन्दोलन के रास्ते चलते राहुल सांकृत्यायन का सामीप्य मिला, और कविता की धारा फैलकर उपन्यासों तक पहुंची।
नागार्जुन, जिनके समयानुसार जाने कितने नाम हुए– वैद्यनाथ मिश्र विद्यार्थी वैदेह यात्री नागार्जुन बाबा– मूलत: कवि ही थे, जनकवि, जो अपने आपको जनता का कवि बतलाते थे और कहते थे– ‘जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं/ जनकवि हूं मैं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं?’ ऐसा भी नहीं कि जनता मानो उनसे पूछती थी। सच में जनता उनसे पूछती थी क्योंकि जनता के बीच रहकर ही वह अपने आपको सहज और रचनाशील पाते थे। कहते– जनता की संगत से बड़ी भाषा की दूसरी कोई प्रयोगशाला नहीं। आलोचकों ने उनकी कविताओं के बारे में लिखा है कि हिन्दी के प्रयोगवादी कवि तो केवल नाम के प्रयोगवादी हैं, बाकी अकेले नागार्जुन ने अपनी कविताओं में जितने प्रयोग किये शायद सारे प्रयोगवादी मिलकर भी उतने न कर सके हों। यह जनता की प्रयोगशाला का प्रसाद था। बड़ा अच्छा तो एकबार नामवर सिंह ने भावुक होकर कहा था– ‘नागार्जुन न होते तो हिन्दी कविता क्या होती? हिन्दी कविता नदी के द्वीप होती। इन्द्रधनुष रौंदे हुए होते और हिन्दी में असाध्य वीणा बजती रही होती। बहुत सुंदर-सुंदर चीजें होतीं, लेकिन बंदूक को चुनौती देनेवाली कोकिला की आवाज नहीं होती– ‘जली ठूंठ पर बैठकर गयी कोकिला कूक/ बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक।’
दूसरी ओर, उनके उपन्यास धरती के रस से इतने सराबोर, जीवन से इतने लबालब हैं कि आज भी जब वैश्विक अध्येताओं को ‘भारतीय उपन्यास’ की खोज होती है तो वे प्रेमचंद के आगे नागार्जुन का ही रुख करते हैं। किसी ने सच लिखा है कि अन्तश्चेतनावादी उपन्यासों से भला भारत को क्या समझा जा सकता है, क्योंकि इसकी तो तमाम परंपराएं पश्चिम के पास अपनी ही हैं। आलोचकों ने उनके उपन्यासों में प्रेमचंद का सीधा विकास पाया था। नागार्जुन के उपन्यासों में जो गांव आते थे, वहां के किसान जमींदार से केवल पिटते न थे, प्रतिरोध करते थे, वहां अखबार आते थे, स्त्री-पुरुष का सहकार पाया जाता था, अन्याय के खिलाफ विरोध होता था।
मूलत: साहित्यकार थे, लेकिन अपनी पक्षधरता की वजह से इतने अनप्रेडिक्टेबल थे कि उनकी कविताई कब आन्दोलन में बदल जाती, यहां तक कि वह गिरफ्तार कर जेल भेज दिये जाएं, कोई नहीं कह सकता था। आपातकाल के विरुद्ध देश जब दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, तमाम वामपंथियों के विरुद्ध जाकर वह इसमें कूद पड़े थे और जेल भेज दिए गये थे। उन्होंने प्रधानमंत्री पर कविता लिखी थी– ‘इसके लेखे संसद-फंसद सब फिजूल है/ इसके लेखे संविधान कागजी फूल है।’
जनांदोलन के प्रति उनकी निष्ठा अचूक थी। शासन के हर अच्छे-बुरे कदम की वह शिनाख्त करते और बेधड़क बताते– ‘रामराज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है/ सूरत-शकल वही है भैया, बदला केवल ढांचा है।’ आमजन का हक उनके लिए कितना मायने रखता था, एक प्रसंग याद आता है। किसी बड़े आयोजन में शामिल होने वह एकबार देहरादून गये। साथ में महेश दर्पण थे। उन्हें पंचसितारा होटल में टिकाया गया। अब दिक्कत थी कि होटल के कर्मचारी मैनेजमेन्ट के खिलाफ हड़ताल पर चले गये थे और इसी बीच नागार्जुन की बुकिंग थी। होटल का मैनेजर घबराया हुआ आया कि बाबा, यहां कुछ अनरेस्ट चल रहा है। लेकिन हम आपको कोई दिक्कत नहीं होने देंगे, खुद आपकी सेवा में रहेंगे। हड़तालकर्मी कौन थे, उनकी मांगें क्या थीं, उन्हें कुछ नहीं पता लेकिन इतना भर जानते थे कि किन हालात में आदमी हड़ताल का रास्ता पकड़ता है। नागार्जुन बोले– सेवा-ऊवा की बात छोड़िये। दर्पण जी, झोला रखिए और चलिये, हम उन्हीं लोगों के साथ जाकर बैठेंगे। और, हड़तालियों ने गेट पर जहां धरना लगाया था, जाकर बैठ गये। दूसरे दिन के अखबार की सुर्खी थी– जनकवि नागार्जुन धरने पर। मैनेजमेन्ट का झुकना कितना आसान हो गया होगा, हम समझ सकते हैं।
अपने जीवन की आखिरी कविताओं में से एक उन्होंने अभिनेत्री शबाना आजमी पर लिखी थी। कविता की जड़ में एक घटना थी। नेल्सन मांडेला भारत-यात्रा पर आए तो शबाना ने अपने समुदाय की ओर से उनका सम्मान-समारोह आयोजित किया। उसमें क्या हुआ कि आयोजन की हार्दिकता पर गदगद होते हुए वयोवृद्ध मांडेला ने शबाना के दोनों गाल चूमे। मुल्लाओं ने बड़ा हो-हल्ला किया कि यह इस्लाम के खिलाफ है। बहुत दिन तक तो शबाना चुप रहीं फिर उन्होंने प्रतिवाद किया– मांडेला सारी दुनिया के बुजुर्गों में श्रेष्ठ हैं। मैं उनके सामने तीन साल की बच्ची हूं। मैं उनकी गोद में बीस बार बैठना चाहूंगी, सौ बार उनसे मिलने अफ्रीका जाऊंगी। रोगशय्या पर पड़े नागार्जुन अपनी इस बिटिया से इतने प्रसन्न हुए कि मानो शिलालेख पर इसे अंकित कर दिया।
हारना नागार्जुन की फितरत में नहीं था। वह कहते थे कि राजा और उनके सिपहसालार तो सब मर-मर जाते हैं लेकिन जनता अमर होती है। जो लोग अपनी कोशिशों में कामयाब नहीं हो पाते, नागार्जुन ने पहला प्रणाम सदा उन्हीं को निवेदित किया– ‘जो नहीं हो सके पूर्णकाम/ मैं करता हूं उनको प्रणाम।’
नागार्जुन का जन्म जेठ पूर्णिमा के दिन 12 जून 1911 को हुआ था और निधन 5 नवंबर 1998 को। उनकी विदाई अद्भुत थी, जो शायद ही किसी लेखक को नसीब हुई हो। बिहार सरकार ने उनकी अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ करने का निर्णय लिया था। लेकिन, उन्हें सम्मान करनेवाली जनता का निर्णय इससे कहीं बड़ा था। सकरी से तरौनी (नागार्जुन का गांव) पांच किलोमीटर पड़ता है। अंतिम यात्रा जब निकली, सड़क के दोनों ओर भारी भीड़ के साथ जनता की अटूट शृंखला थी, जिसकी संख्या लाखों में ही आंकी जा सकती थी। चलन के मुताबिक तो यही कहा जाएगा कि भीड़ का मकसद अंतिम दर्शन था, लेकिन दर्शन की तो अभी शुरुआत थी। वह तो खुद ही कहते थे– ‘देखोगे, सौ बार मरूंगा/ देखोगे, सौ बार जिऊंगा।’
(तारानंद वियोगी ने अभी हाल में नागार्जुन की जीवनी ‘युगों का यात्री’ लिखी है, जो राजकमल प्रकाशन से शीघ्र आनेवाली है।)
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